Budget 2026: वित्त मंत्री जी! बजट में दीजिए व्यापारियों के दर्द की दवा... सरकार से की ये खास मांग
बजट में दिखे एक ट्रेड एक टैक्स व्यवस्था
लखनऊ, अमृत विचार: रविवार को केंद्र सरकार अपना बजट लेकर आ रही है। पहली फरवरी को संसद में पेश होने वाले इस बजट में व्यापारियों ने वित्तमंत्री के समक्ष अपना दर्द रखा है। कपड़ा कारोबारी हों या फिर कीमतों की रफ्तार से पटरी से उतर चुका सर्राफा कारोबारी। संगठनों ने व्यापारियों को जटिल कर संरचना से राहत देते हुए एक ट्रेड एक टैक्स व्यवस्था को लागू करने की मांग सरकार से की है। ई-कामर्स पॉलिसी लागू करने, पोर्टल की तकनीकी खामियों का पुराना मर्ज फिर से उठाया। कई अन्य मुद्दों पर व्यवसायिक संगठनों के प्रमुखों और विभिन्न ट्रेड के व्यापारियों ने इस बजट में सरकार से कुछ अपेक्षाएं की हैं। इस सिलसिले में वित्तमंत्री को मेल भी व्यापारियों ने किया है।
पेश है व्यापारियों से बातचीत के अंश...
बजट में व्यापारियों की तीन प्रमुख मांगों को लाया जाए। सरकारी कर्मचारी की तरह कारोबारियों का स्वास्थ्य बीमा लागू किया जाए। जीएसटी में पंजीकृत व्यापारियों की दुकान जलने पर भरपाई के लिए एक करोड़ और लेट होने पर ली जाने वाली ब्याज दर को बैंक की एफडी के समान या फिर अधिकतम नौ प्रतिशत की दर से ही लिया जाए। इससे ज्यादा नहीं।
-बनवारी लाल कंछल, प्रदेश अध्यक्ष उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल
व्यापारियों को जटिल कर संरचना से राहत देते हुए एक ट्रेड–एक टैक्स व्यवस्था को लागू किया जाए। ऑनलाइन व्यापार (ई-कॉमर्स) पर अतिरिक्त कर लगाया जाए। टीडीएस की दो दरें (1 या फिर 5 प्रतिशत) रखी जाएं। कच्चे माल पर अधिक और तैयार माल पर कम टैक्स दर के कारण फंसने वाले आईटीसी क्लेम के ऑटोमेटिक रिफंड की व्यवस्था होनी चाहिए।
-अमरनाथ मिश्र, अध्यक्ष लखनऊ व्यापार मंडल
हर साल कपडे़ में किसी न किसी रूप में पांच फीसद की बढ़ोत्तरी हो जाती है। चाहे वह यार्न की तेजी हो या कपास में और कपड़े की प्रोसिसिंग। रेडीमेड पर 18 प्रतिशत जीएसटी ली जा रही है। पॉलिएस्टर यार्न में 12 फीसद। ऐसे में कपड़े की कीमत में लगातार बढ़ोत्तरी जारी है। हर तरह के कपडे़ पर पांच फीसद ही जीएसटी की दर रखी जाए।
-अशोक मोतियानी, अध्यक्ष उप्र, कपड़ा उद्योग व्यापार मंडल
ई-कामर्स पॉलिसी, रिटेल ट्रेड पॉलिसी, स्वास्थ्य बीमा, हाउसिंग लोन में रिबेट, एमएसएमई लोन का सरलीकरण, बाजारों में सीसीटीवी कैमरे के लिए अलग से फंड की व्यवस्था, नेशनल फेसलेस स्कीम में जिन आयकरदाता का विवादित आयकर पचास लाख से कम हो उनके केस, उन्हीं के न्यायिक क्षेत्र में होने चाहिए।
-संजय गुप्ता, अध्यक्ष उप्र. आदर्श व्यापार मंडल
सोने-चांदी के भाव में निरंतर बदलाव ने कारोबारियों और ग्राहकों को असहज कर दिया है। बाजारों में सन्नाटा है। सहालग के मौसम में जहां शोरूम ग्राहकों से पटे रहते थे आज वह खाली हैं। कीमतों में स्थिरता आवश्यक है। लोग पुराने जेवरों को रीसाइकिल करा काम चला रहे हैं। यह अच्छे संकेत नहीं है। सरकार तत्काल इस पर ठोस पहल करे।
-अनुराग रस्तोगी, स्टेट हेड इंडिया बुलियन ज्वैलर्स एसोसिएशन (इब्जा)
ई-कामर्स और ऑनलाइन कारोबार के लिए पॉलिसी बनाई जाए। ऑनलाइन पर कंट्रोल हो, सेस लगे नहीं तो आगामी पांच साल में मोबाइल का खुदरा बाजार खत्म हो जाएगा। ऑनलाइन कंपनियों पर नकेल कसना जरूरी है। नियम कानून स्पष्ट होने चाहिए। इलेक्ट्रानिक बाजार में बड़ी कंपनियां अपनी मोनोपोली बना मनमाने ढंग से काम कर रही हैं।
-नीरज जौहर, प्रदेश अध्यक्ष उप्र. मोबाइल एसोसिएशन
कर प्रणाली में सरलीकरण और राहत की आवश्यकता है। जीएसटी प्रवर्तन में तकनीकी त्रुटियों को कर चोरी मानकर भारी ब्याज और पेनाल्टी लगाई जा रही है, जिससे भय का वातावरण बना है। स्थानीय व्यापार का संरक्षण और डिजिटल संतुलन- ई-कॉमर्स के अनियंत्रित भारी डिस्काउंट से स्थानीय बाजार प्रभावित हो रहे हैं। एक संतुलित नीति बनाकर डिस्काउंट पर नियंत्रण किया जाए। व्यापारियों को मासिक पेंशन, स्वास्थ्य बीमा योजना का लाभ मिले।
-संदीप बंसल, राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल
स्टेशनरी कारोबार में अलग-अलग चीजों पर अलग-अलग जीएसटी की दरें हैं। शैक्षणिक सामग्री पर न्यूनतम जीएसटी दर होनी चाहिए। 18 प्रतिशत तो कतई नहीं। हर आइटम पर अलग कर है। इससे कारोबार का स्वरूप बिगड़ा हुआ हे। चीजें महंगी हैं। इसका नुकसान उपभोक्ता तो कभी फुटकर और थोक विक्रेता को होता है। एक ट्रेड एक कर की अवधारणा लागू करे सरकार।
-जितेंद्र सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष विक्रेता एवं स्टेशनरी निर्माता एसोसिएशन
हर वर्ष कीमतों में पांच से सात फीसद की बढ़ोत्तरी कर दी जाती है। कपड़ा कारोबार पर पांच फीसद से ज्यादा टैक्स नहीं होना चाहिए। यार्न में अलग जीएसटी दर है। रेडीमेड में अलग है। पॉलिस्टर यार्न और प्रोसेसिंग में इजाफा कर कीमतें बढ़ा दी जाती हैं। कॉटन, इंब्राडरी, बनारसी समेत सभी तरह के कपडे़ महंगे हैं। इन पर जीएसटी कम होनी चाहिए।
-प्रभू जालान, महामंत्री स्वदेशी मार्केट एवं साड़ी के थोक व्यापारी
