इतिहास व रहस्य का संगम लेपाक्षी

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Published By Anjali Singh
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लेपाक्षी मंदिर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के एक छोटे से गांव में है, जिसे लेपाक्षी गांव के नाम से ही जाना जाता है। इसके सबसे पास का शहर हिन्दूपुर है। यह हिन्दूपुर शहर से 15 किलोमीटर पूर्व में तथा बेंगलुरु के 120 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। मंदिर को कुर्म सैला के विशाल पहाड़ों के बीच चट्टान को काटकर ग्रेनाइट के पत्थरों की सहायता से बनाया गया है। यह पहाड़ एक कछुए के आकार में हैं, इसलिए इन्हें कुर्म सैला/ कुर्मासेलम के नाम से जाना जाता हैं। संस्कृत भाषा में कछुए को कुर्म कहा जाता है। -अजय कुमार त्रिवेदी उप निदेशक युवा कल्याण विभाग

कुर्म सैला की गोद में बसा मंदिर

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लेपाक्षी मंदिर कुर्म सैला नामक पहाड़ियों के बीच स्थित है। ये पहाड़ कछुए के आकार के हैं, इसलिए इन्हें कुर्म सैला या कुर्मासेलम कहा जाता है। संस्कृत में ‘कुर्म’ का अर्थ कछुआ होता है। मंदिर का निर्माण इन विशाल चट्टानों को काटकर ग्रेनाइट पत्थरों से किया गया है। पहली दृष्टि में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि शिल्प और स्थापत्य का जीवंत इतिहास है।

रामायण से जुड़ी अमर कथा

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लेपाक्षी की पहचान रामायण काल की एक अत्यंत करुण और वीर गाथा से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और माता सीता के साथ वनवास के अंतिम चरण में यहाँ ठहरे थे। इसी दौरान रावण ने मारीच की सहायता से माता सीता का अपहरण किया। पुष्पक विमान से लंका ले जाते समय यह दृश्य जटायु ने देख लिया। जटायु ने रावण से आकाश में भीषण युद्ध किया, लेकिन अंततः रावण ने उसका एक पंख काट दिया। घायल जटायु राम नाम लेते हुए इसी भूमि पर गिर पड़े। जब श्रीराम माता सीता की खोज में यहाँ पहुँचे, तो उन्होंने जटायु को कराहते हुए पाया।

‘ले पाक्षी’ से बना लेपाक्षी

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श्रीराम ने जटायु का सिर अपनी गोद में रखा और बार-बार “ले पाक्षी, ले पाक्षी” कहते रहे, जिसका तेलुगु भाषा में अर्थ है- ‘उठो पक्षी।’ जटायु ने माता सीता के अपहरण की पूरी कथा सुनाई और श्रीराम की गोद में ही अपने प्राण त्याग दिए। श्रीराम ने पुत्रवत् जटायु का अंतिम संस्कार किया। तभी से इस स्थान का नाम लेपाक्षी पड़ा और मंदिर लेपाक्षी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

स्वयंभू शिवलिंग और प्राचीन मान्यताएं

लेपाक्षी मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है, जिसकी जड़ें सतयुग से जोड़ी जाती हैं। मान्यता है कि यहाँ स्थित स्वयंभू शिवलिंग की स्थापना महर्षि अगस्त्य ने की थी। रामायण काल में दो और शिवलिंग स्थापित किए गए—एक भगवान श्रीराम द्वारा और दूसरा भक्त हनुमान द्वारा। लंबे समय तक ये शिवलिंग खुले आकाश के नीचे रहे और बाद में मंदिर का निर्माण हुआ।

विजयनगर काल का स्थापत्य वैभव

16 वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य के दौरान विरुपन्ना और विरन्ना नामक दो भाइयों ने इस विशाल मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर की स्थापत्य शैली, नक्काशी, स्तंभ और भित्ति-चित्र विजयनगर कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। मंदिर निर्माण की तिथि को लेकर मतभेद हैं, लेकिन सामान्यतः इसका निर्माण 1520 से 1585 ईस्वी के बीच पूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि मंदिर की अद्भुत बनावट के पीछे कुछ रहस्यमयी शक्तियों का भी योगदान रहा है, क्योंकि इसकी संरचना आज भी इंजीनियरों और स्थापत्य विशेषज्ञों को चकित करती है।

वीरभद्र और शक्ति की उपासना

दक्ष प्रजापति के यज्ञ और माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव के रूद्र रूप वीरभद्र के प्रकट होने की कथा भी इस मंदिर से जुड़ी है। मान्यता है कि महर्षि अगस्त्य ने भगवान शिव के इसी वीरभद्र रूप को समर्पित विशाल शिवलिंग और मंदिर का निर्माण यहाँ करवाया था, जिससे यह स्थान शक्ति और तपस्या का केंद्र बन गया।

माता सीता का चरणचिह्न

मंदिर परिसर में एक विशाल पैर की छाप दिखाई देती है, जिसे माता सीता का चरणचिह्न माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार जब रावण माता सीता को लंका ले जा रहा था और जटायु घायल होकर यहाँ गिरे थे, तब माता सीता ने श्रीराम को संदेश देने के लिए यह छाप छोड़ी थी। इस स्थान पर खड़े होकर रामायण की करुण कथा मानो सजीव हो उठती है।

नृत्य मंडप और झूलता हुआ स्तंभ

विजयनगर काल में मंदिर के भीतर भव्य नृत्य मंडप का निर्माण किया गया। मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह इसी स्थान पर हुआ था। नृत्य मंडप कभी 70 स्तंभों पर टिका हुआ था। यहां का सबसे बड़ा रहस्य है हैंगिंग पिलर एक ऐसा स्तंभ, जो धरती से कुछ सेंटीमीटर ऊपर उठा हुआ है। 1902 ईस्वी में एक अंग्रेज इंजीनियर हैमिल्टन ने इसका रहस्य जानने का प्रयास किया, जिससे एक स्तंभ ऊपर उठ गया लेकिन टूटा नहीं। आज भी श्रद्धालु इसके नीचे से कपड़ा निकालने का प्रयास करते हैं और इसे मनोकामना पूर्ति से जोड़ते हैं।

विश्व का विशाल एकाश्म शिवलिंग

लेपाक्षी मंदिर में स्थित स्वयंभू शिवलिंग को विश्व का सबसे बड़ा एकाश्म शिवलिंग माना जाता है। इसे एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसके पीछे सात मुखों वाला विशाल शेषनाग विराजमान है, जो मंदिर को और भी दिव्य, भव्य और रहस्यमय बना देता है। लेपाक्षी की यात्रा केवल एक मंदिर दर्शन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, रामायण की गाथा और प्राचीन स्थापत्य से साक्षात्कार है। यहां हर पत्थर, हर स्तंभ और हर कथा इतिहास और आस्था की कहानी कहती है। लेपाक्षी से लौटते समय मन मंर यही भाव रहता है कि कुछ स्थल केवल देखे नहीं जाते, वे भीतर तक उतर जाते हैं।