हाईकोर्ट ने फिर खारिज की सब-इंस्पेक्टर की जमानत याचिका, भ्रष्टाचार और अवैध वसूली से जुड़ा है मामला

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के गंभीर आरोपों से जुड़े मामले में आरोपी सब-इंस्पेक्टर की दूसरी जमानत अर्जी खारिज करते हुए कहा कि आरोपी के कब्जे से बड़ी रकम की बरामदगी, अपराध की गंभीरता और पूर्व में जमानत याचिका खारिज होने के तथ्य को देखते हुए याची को राहत नहीं दी जा सकती है। केवल प्राथमिकी में याचियों के नाम अंकित ना होने के आधार पर अपराध में उनकी असंलिप्तता सिद्ध नहीं होती है यानी इस स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता है कि उनके विरुद्ध कोई अपराध ही नहीं बनता है।

उक्त आदेश न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकलपीठ ने सब-इंस्पेक्टर आलोक सिंह की दूसरी जमानत याचिका खारिज करते हुए पारित किया। हालांकि याची के अधिवक्ता ने कहा कि निष्पक्ष विचारण एवं अभियुक्त के समुचित बचाव के लिए कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) का संरक्षण तथा पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी फुटेज का संकलन आवश्यक है, क्योंकि संपूर्ण अभियोजन मामला झूठा एवं गढ़ा हुआ बताया जा रहा है।

यह भी तर्क दिया गया कि यदि उक्त दस्तावेज एवं विवरण संकलित एवं सुरक्षित नहीं किए गए, तो आवेदक को अपने बचाव का उचित अवसर नहीं मिल पाएगा। उपरोक्त तर्क का खंडन करते हुए कोर्ट ने कहा कि विवेचना अधिकारी को सीसीटीवी फुटेज संकलित कर उसे विवेचना का हिस्सा बनाने का निर्देश देना, विवेचना में हस्तक्षेप करने के समान होगा, जबकि वर्तमान मामले में हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता है।

याची के खिलाफ गोरखपुर के पुलिस स्टेशन कोतवाली में आईपीसी की विभिन्न धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 के तहत 9 अप्रैल 2024 को दर्ज प्राथमिकी में कारोबारी नवीन कुमार श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि 3 अप्रैल 2024 को चुनाव आचार संहिता के दौरान पुलिस ने उनके पास मौजूद 50 लाख रुपये जब्त कर लिए और बाद में लौटाने से इनकार कर दिया। जांच के दौरान सब-इंस्पेक्टर आलोक सिंह के कब्जे से 30 लाख रुपये तथा सह-आरोपी प्रिंस श्रीवास्तव से 14 लाख रुपये की बरामदगी हुई। इस पर कोर्ट ने माना कि इतनी बड़ी नकदी की बरामदगी को “झूठे फंसाव” के तर्क से खारिज नहीं किया जा सकता है।

यह भी रेखांकित किया गया कि सह-आरोपी की जमानत पहले ही खारिज हो चुकी है और आरोपी की भूमिका प्रथम दृष्टया गंभीर है। विवेचना का उद्देश्य सत्य का उद्घाटन करना तथा अभियुक्तों की भूमिका को स्पष्ट करना होता है। विवेचना के दौरान प्रथम सूचक ने स्पष्ट रूप से दोनों आवेदकों यानी प्रचंड प्रताप सिंह एवं विशाल तिवारी के नाम बताए हैं और उन्हें विशिष्ट भूमिकाएँ भी सौंपे जाने का उल्लेख भी है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि कार्यवाही निरस्तीकरण से संबंधित कानून कठोर हैं। याचिका निरस्तीकरण के चरण पर केवल अभियोजन की सामग्री को ही देखा जाना होता है और इस चरण में न्यायालय अभियुक्त के बचाव में साक्ष्यों का परीक्षण नहीं कर सकता है।सीआरपीसी की धारा 482 के अंतर्गत शक्तियों का प्रयोग करते हुए  विवादित तथ्यात्मक प्रश्नों का निस्तारण इस स्तर पर नहीं किया जा सकता।

इसी के साथ कोर्ट ने याची द्वारा पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी फुटेज और अन्य तकनीकी साक्षी जताने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी, साथ ही जांच को पुलिस को विशेषाधिकार बताते हुए जांच में किसी भी हस्तक्षेप से इनकार किया, साथ ही सह-आरोपी विशाल तिवारी और प्रचंड प्रताप सिंह द्वारा चार्जशीट और संपूर्ण कार्यवाही रद्द करने की मांग भी अस्वीकार कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान दोनों की भूमिका सामने आई है और इस स्तर पर साक्ष्यों का सूक्ष्म मूल्यांकन कर कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती। अंत में कोर्ट ने मामले को 29 मई 2026 के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

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