युवाओं-बच्चों पर गहरा असर डाल रहा सोशल मीडिया, जानिए काउंसलर की राय

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
On

गौरव जोशी, नैनीताल। सोशल मीडिया आज युवाओं और बच्चों की दुनिया का अहम हिस्सा बन चुका है। लेकिन यह दुनिया जितनी रंगीन दिखती है, उतनी ही खतरनाक भी साबित हो रही है। मोबाइल की स्क्रीन पर मिलने वाले ‘लाइक’, ‘कमेंट’ और ‘व्यू’ धीरे-धीरे मानसिक संतुष्टि का साधन बन जाते हैं-और यही संतुष्टि कब आदत, फिर लत में बदल जाती है, इसका अहसास अक्सर परिवार को तब होता है जब स्थिति हाथ से निकल चुकी होती है।

महिला एवं बाल विकास विभाग के वन स्टॉप सेंटर की काउंसलर डॉ. ममता बगड़वाल बताती हैं कि किसी भी मानसिक आदत का बनना रातों-रात नहीं होता, और न ही उसका समाधान जल्दबाजी में संभव है। “जैसे ब्लड प्रेशर या शुगर शरीर की बीमारियाँ हैं, वैसे ही मानसिक अस्थिरता भी एक स्थिति है। इसके अलग-अलग स्तर होते हैं, जो हमारे सामाजिक और शारीरिक तालमेल को बिगाड़ देते हैं,” वे कहती हैं। समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब अभिभावक लंबे समय से पनप रही इस आदत को अचानक बलपूर्वक रोकने की कोशिश करते हैं—फोन छीन लेना, डाँटना या धमकाना। यह मस्तिष्क और शरीर के बीच एक हिंसक संघर्ष पैदा करता है, जो कई बार आत्मघाती विचारों तक ले जा सकता है।

डॉ. ममता की एक केस स्टडी इस सच्चाई को बखूबी उजागर करती है।19 वर्षीय एक किशोरी के लिए इंस्टाग्राम और फेसबुक पर ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ पाना आत्म-संतुष्टि का जरिया बन चुका था। खुद को आकर्षक साबित करने की भूख ने धीरे-धीरे उसे सही-गलत के फर्क से दूर कर दिया। जर्नल ऑफ एडोलसेंस के शोध भी बताते हैं कि सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रभाव किशोरों की निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर करता है।

स्थिति तब चरम पर पहुँची, जब वह किशोरी ब्लैकमेलिंग का शिकार हो गई। ऐसे मामलों में अक्सर परिवार की पहली प्रतिक्रिया डाँट-फटकार या मोबाइल छीनने की होती है, लेकिन इस केस में मनोवैज्ञानिक सहयोग ने उसकी जान बचाई। उसे डराने के बजाय यह भरोसा दिलाया गया कि वह सुरक्षित है। गोपनीयता और सुरक्षा के संतुलन के साथ परिवार को भी शामिल किया गया, ताकि घर पर एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम बन सके।

सबसे अहम रहा समाधान का क्रमबद्ध तरीका। डिजिटल लत को अचानक खत्म करने के बजाय, उसे पढ़ाई और रोजगार जैसी सार्थक गतिविधियों से बदला गया। यह मस्तिष्क के ‘रिवॉर्ड सिस्टम’ को दोबारा संतुलित करने की प्रक्रिया थी। परिणाम विनाश से विकास की ओर गया—आज वह किशोरी पढ़ भी रही है और कमा भी रही है। यह केस बताता है कि युवाओं को फैसलों की नहीं, सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है।

इसी तरह दूसरी केस स्टडी में एक युवक ऑनलाइन गेमिंग और त्वरित धन कमाने की लत में फँस गया। ‘शॉर्टकट’ से मिलने वाली संतुष्टि ने उसके विवेक को शून्य कर दिया और परिवार पर भावनात्मक व आर्थिक दबाव बढ़ता चला गया। घर अवसाद और तंगी की कगार पर पहुँच गया। यह मस्तिष्क के रिवॉर्ड सिस्टम में आए असंतुलन का नतीजा था। बदलाव की प्रक्रिया आसान नहीं रही-कई बार असफलताएँ भी मिलीं-लेकिन परिवार के धैर्य और विशेषज्ञों के क्रमबद्ध परामर्श ने उसे टूटने से बचा लिया। नकारात्मक व्यवहार को दबाने के बजाय, उसे सार्थक कार्यों और आत्मनिर्भरता की ओर मोड़ा गया।

इन कहानियों का संदेश साफ है-सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेमिंग की लत से निकलना असंभव नहीं, बशर्ते प्रक्रिया क्रमबद्ध हो और उसमें धैर्य, संवाद व सहानुभूति शामिल हो। जल्दबाजी समाधान नहीं, बल्कि विनाश का कारण बन सकती है। युवाओं को समझने वाला हाथ और सही दिशा देने वाला मार्गदर्शन मिले, तो भटकाव से स्थिर और सफल जीवन की वापसी संभव है।

संबंधित समाचार