संपादकीय: अवसर और आशंकाएं  

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Published By Monis Khan
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अनिश्चितताओं से घिरी वैश्विक अर्थव्यवस्था जब आपूर्ति के नए संतुलन की तलाश में हो तब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ व्यापार समझौते के ढांचे पर सहमति व्यापारिक तनाव में कमी निवेश, निर्यात और प्रौद्योगिकी सहयोग के नए द्वार खोलेगी, हालांकि इस अवसर के बावजूद जनता और नीति-निर्माताओं के यह प्रश्न बना हुआ है कि यह समझौता संतुलित है किंचित झुकाव लिए हुए? संयुक्त बयान के बाद साफ है कि यदि भारत अमेरिका से आयात तीन गुना तक बढ़ाता है, तो हमारा व्यापार अधिशेष घटेगा।

इससे अमेरिकी निर्यातकों और ऊर्जा कंपनियों को तत्काल लाभ होगा, जबकि भारत को अपेक्षित लाभ तभी मिलेगा जब सेवाओं विशेषकर आईटी और फार्मा में बाज़ार पहुंच वास्तविक रूप से विस्तारित हो, जिस पर बात अभी स्पष्ट नहीं है। अमेरिका द्वारा भारत पर टैरिफ को 50% करने से पहले औसत टैरिफ लगभग 2-3% था, जो 2024 में भारतीय निर्यात पर लागू था, अमेरिका ने पहले शुल्क बढ़ाए और अब आंशिक रियायत देकर समझौता प्रस्तुत किया, बेशक यह ‘पहले दबाव, फिर राहत’ की रणनीति है, लेकिन अब इस पर बात बेमानी है। 

अच्छा है कि हमने अपने संवेदनशील कृषि और डेयरी क्षेत्रों पर कोई व्यापक छूट न देकर सावधानी दिखाई है। मक्का, गेहूं, दाल, चावल, सोया, पोल्ट्री, डेयरी और एथेनॉल जैसे क्षेत्रों पर टैरिफ़ संरक्षण जारी रहना, किसानों के लिए आश्वस्तकारी संकेत है। फिर भी अमेरिकी ताज़े फल, मेवे और पशु आहार सस्ते होकर भारतीय बाज़ार में आएंगे, तो घरेलू उत्पादकों पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बढ़ेगा। यही कारण है कि किसान संगठन अमेरिकी कृषि उत्पादों पर टैरिफ़ में कटौती का विरोध कर रहे हैं। उन्हें आशंका है कि सस्ती आयातित उपज से एमएसपी और सार्वजनिक खरीद प्रणाली पर दबाव बढ़ेगा। 

कार्यकारी आदेश 14329 की धारा सात के तहत अमेरिका यह निगरानी करेगा कि भारत रूस से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तेल आयात न करे, अन्यथा 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क पुनः लागू किया जा सकता है। भारत ने अब तक स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि वह रूसी तेल खरीद पूरी तरह बंद करेगा। रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के तहत भारत बहु-स्रोत ऊर्जा आयात को प्राथमिकता देता रहा है। 500 अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और अन्य उत्पादों की खरीद की सहमति तभी पूरी हो सकेगी, जब इसमें बोइंग विमान, हेलिकॉप्टर और संभावित परमाणु रिएक्टर जैसे बड़े सौदे शामिल होंगे। ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में बड़े आयात से सामरिक साझेदारी मजबूत होगी, परंतु घरेलू रक्षा उद्योग ‘मेक इन इंडिया’ पर उसका प्रभाव संतुलित करना अनिवार्य है। 

प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और संयुक्त उत्पादन सुनिश्चित किए बिना यह निर्भरता बढ़ाएगा। आईटी और अन्य सेवाओं के क्षेत्र में वीज़ा, डेटा और डिजिटल क्षेत्र में भारत वास्तविक बढ़त रखता है। यहां व्यापार नियमों पर स्पष्टता आवश्यक है। कुल मिलाकर सरकार, विदेश और वाणिज्य मंत्रालय को विस्तृत श्वेत पत्र जारी कर प्रत्येक क्षेत्रीय प्रभाव स्पष्ट करना चाहिए; यदि संतुलन, स्पष्टता और रणनीतिक स्वायत्तता बनी रहती है, तो यह समझौता अवसर सिद्ध हो सकता है, अन्यथा आशंकाएं विमर्श पर हावी रहेंगी।