ठेके पर मुशायरा: विंडरमेयर थिएटर फेस्टिवल में हंसते-हंसाते दिखायी उर्दू शायरी की दुर्दशा

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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बरेली, अमृत विचार। विंडरमेयर थिएटर फेस्टिवल के छठवें दिन दिल्ली से आए साइक्लोरामा ग्रुप के कलाकारों ने दिवंगत शायर और नाटककार इरशाद खान सिकंदर का लिखा नाटक ''ठेके पर मुशायरा'' प्रस्तुत किया। इसके निर्देशक दिलीप गुप्ता हैं। यह नाटक मुशायरों के व्यावसायीकरण पर कटाक्ष करता है और उर्दू शायरी की मौजूदा स्थिति पर चिंतन भी। नाटक जताता है कि अब अच्छी शायरी की जगह गिरोहबंदी, तुकबंदी और चलताऊ गलेबाजी को बढ़ावा मिल रहा है।

उस्ताद शायर कमान लखनवी की माली हालत खस्ता है। महीनों से घर का किराया नहीं दे सके हैं। मालिक मकान ने निकाल फेंकने की धमकी दी है। राम भरोसे `गालिब’ नाम का सस्ता शायर सलाह देता है कि एक ओपन माइक से पैसों का जुगाड़ हो सकता है। ठेकेदार ''छांगुर'' के माध्यम से ओपन माइक की सेटिंग की जाती है। बेचारे उस्ताद न चाहते हुए भी ठेके पर मुशायरे में चले जाते हैं। वहां हालात ये हैं कि आयोजक बीच-बीच में आयोजन मंडली के सदस्य को कुत्ते से बचाने की अपील करता रहता है। कोई चोरी की गजल पढ़ रहा है तो कोई फूहड़ शायरी और तुकबंदी से काम चला रहा है। खैर, किसी तरह मुशायरा खत्म होता है मगर उस्ताद के हालात नहीं बदलते। असल में आयोजक पैसा दिए बिना ही गायब हो जाता है।

''ठेके पर मुशायरा'' के किरदार हंसते-हंसाते दर्शकों को अचानक गंभीर चिंतन की तरफ ले चलते हैं। इन हालात में अच्छे शायरों पर क्या गुजरती है, यह भी इस नाटक में दिखाया गया है। शिवम पाठक ने अनुराग आहन, यशस्विनी बोस ने मैना सहगल, गौरव कुमार ने सफर अकमल व छांगुर ऑलराउंडर, आमिर खान ने बाग देहलवी, राज तंवर ने तेवर ख्यालपुरी, योगेश सोमी भट्ट ने उस्ताद कमन लखनवी, दिलीप कुमार ने रोमी डिसूजा व राम भरोसे गालिब के किरदार निभाए हैं। यशस्विनी बोस ने कॉस्ट्यूम, शिवम पाठक ने प्रॉप्स, राज तंवर ने सेट्स, नितिन शर्मा ने म्यूजिक ऑपरेशन, आलोक तुमुल ने लाइट डिजाइन और गौरव कुमार ने प्रोडक्शन मैनेजर की जिम्मेदारी निभाई हैं।

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