बोध कथा: ईमानदारी का फल
एक था चेकपोस्ट का अधिकारी, धीरज। वह अत्यंत ईमानदार, संतोषी और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति था। भ्रष्टाचार के इस युग में ऐसे व्यक्ति का जीवन आसान नहीं होता। चारों ओर से समझौते की नीति अपनाने का दबाव रहता, छोटे-बड़े लोग तरह-तरह से उसे प्रभावित करने का प्रयास करते, परंतु धीरज अपने सिद्धांतों पर अडिग रहा। बार-बार होने वाले स्थानांतरण उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके थे, किंतु उसने कभी शिकायत नहीं की।
एक बार उसने तस्करी का एक बड़ा माल पकड़ा। माल का मालिक एक प्रभावशाली व्यापारी था, जिसके संबंध बड़े-बड़े राजनेताओं और अधिकारियों से थे। पहले तो उसने धीरज को प्रलोभन देने का प्रयास किया और यहां तक कह दिया कि यदि वह आंख मूंद ले तो पचास लाख रुपये देने को तैयार है, पर धीरज तनिक भी विचलित नहीं हुआ।
इसके बाद नेताओं और मंत्रियों के फोन आने लगे, दबाव डाला जाने लगा, किंतु उसने किसी की नहीं सुनी। उसने नियमों के अनुसार चालान किया और पूरा माल जब्त कर लिया। मामला न्यायालय पहुंचा, परंतु धन और प्रभाव के बल पर केस शीघ्र ही खारिज हो गया। ऊपर से मंत्रियों की नाराज़गी का परिणाम यह हुआ कि धीरज को अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा। इतनी बड़ी क्षति के बाद भी वह टूटा नहीं। उसका आत्मसम्मान और ईमानदारी आज भी उतनी ही दृढ़ थी।
कुछ समय बाद एक बड़े उद्योगपति को इस पूरी घटना की जानकारी मिली। उसने धीरज को बुलाया और उसकी निष्ठा से प्रभावित होकर अपनी कंपनी में सर्वोच्च पद पर सम्मान सहित नियुक्त कर लिया। यहां उसे न केवल पहले से अधिक वेतन मिला, बल्कि सभी आवश्यक सुविधाएं भी प्राप्त हुईं। धीरज अब पहले से भी अधिक सतर्क और जिम्मेदार हो गया। वह मालिक के हितों की रक्षा करता और अधीनस्थ कर्मचारियों के अधिकारों तथा कल्याण का विशेष ध्यान रखता।
प्रत्येक माह वह सभी कर्मचारियों की बैठक करता, जिसमें कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी, संतोष और परोपकार जैसे मूल्यों पर चर्चा करता। उसके नेतृत्व में कंपनी निरंतर उन्नति करने लगी। एक दिन उसने उद्योगपति को धन की असारता का बोध कराते हुए शिक्षा, चिकित्सा और असहायों की सहायता के लिए एक ट्रस्ट बनाने का सुझाव दिया। उद्योगपति ने सहर्ष यह प्रस्ताव स्वीकार किया और धीरज को ही ट्रस्ट का सचिव बना दिया। अब कंपनी की आय का एक निश्चित अंश लोककल्याण के कार्यों में व्यय होने लगा। ठीक ही कहा गया है- धन तो बहुतों को मिल जाता है, पर उसका सदुपयोग वही कर पाता है, जिसके जीवन में ईमानदारी और पुण्य का प्रकाश हो।
