समुद्र का सौंदर्यपूर्ण संगम मुरुदेश्वर

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Published By Anjali Singh
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मुरुदेश्वर कर्नाटक राज्य में अरब सागर के किनारे स्थित भटकल नगर से 13 किमी दूर स्थित उत्तर कन्नड़ जिले का एक धार्मिक और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध नगर है। यहां विश्व का दूसरी सबसे बड़ी 123 फिट ऊंची भगवान शिव की मूर्ति स्थापित है। इसे अरब सागर में बहुत दूर से देखा जा सकता है। इस मूर्ति को इस तरह बनाया गया है कि सूरज की किरणें पड़ने से यह चमकती रहे। इसे बनाने में दो साल लगे थे और शिवमोग्गा के काशीनाथ और अन्य मूर्तिकारों ने बनाया था। -आचार्य अमरेश मिश्र, पीठाधीश्वर शकुंतला शक्ति पीठ विकास नगर कानपुर 

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बेंगलुरु से मुरुदेश्वर पहुंचने के लिए हमने ट्रेन का चुनाव किया। रोज शाम 6.50 बजे बेंगलुरु से चलने वाली पंचगंगा एक्सप्रेस दूसरे दिन सुबह छह बजे मुरुदेश्वर पहुंचा देती है। मंदिर स्टेशन के पास ही स्थित है, लेकिन हमने पहले होटल पहुंचने का निश्चय किया। मुरुदेश्वर का सागरतट काफी खूबसूरत माना जाता है। पर्यटकों को यहां धार्मिक स्थल के साथ प्राकृतिक सुंदरता का आनंद भी मिलता है। कन्दुका पहाड़ी पर, तीन ओर से पानी से घिरा मुरुदेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यहां भगवान शिव का आत्म लिंग स्थापित है। यहां का राजा गोपुरा या राज गोपुरम विश्व में सब से ऊंचा गोपुरा माना जाता है।

यह 20 मंजिल के बराबर करीब 249 फीट ऊंचा है। इस विशाल मीनार जैसे गोपुरम में लिफ्ट लगी है, जिसके ऊपर से अरब सागर और भगवान शिव की प्रतिमा का अद्भुत नजारा नजर आता है। इस गोपुरम को एक स्थानीय व्यवसायी ने बनवाया था। द्वार पर दोनों तरफ सजीव हाथी के बराबर ऊंची हाथी की मूर्तियां बनी हैं। मंदिर में दर्शन के लिए जींस-टीशर्ट की मनाही है। मुरुदेश्वर मंदिर हिन्दू स्थापत्य शैली (द्रविड़ शैली) में बना है, जिसमें चालुक्य और काम्बा राजवंश की मूर्तिकला-शैली और ग्रेनाइट निर्माण देखने योग्य है। यहां अब पर्यटकों की बढ़ती संख्या देखते हुए स्कूबा डाइवंग और वॉटर स्पोर्टस के भी इंतजाम किए गए हैं। 

पौराणिक कथा 

मुरुदेश्वर मंदिर में भगवान शिव का आत्मलिंग स्थापित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण ने अमरता का वरदान पाने के लिए भगवान शिव की कठिन तपस्या की। इससे प्रसन्न भगवान शिव ने उसे एक शिवलिंग दिया, जिसे ‘आत्मलिंग’ कहा जाता है। शिव ने कहा कि अगर तुम अमर होना चाहते हो, तो इसे लंका ले जाकर स्थापित कर देना, लेकिन एक बात ध्यान रखना कि इसे जिस स्थान पर रख दोगे, ये वहीं स्थापित हो जाएगा। रावण के अजेय होकर पृथ्वी को नष्ट करने की आशंका से भयभीत होकर नारद तुरंत गणेश जी के पास पहुंचे और एक योजना बनी। रावण संध्याकाल में विशेष उपासना करता था। जब वह गोकर्ण के पास था, तब भगवान विष्णु ने अपनी शक्ति से संध्याकाल का भ्रम उत्पन्न किया। गणेश जी ब्राह्मण बालक के रूप में रावण के सामने पहुंचे। रावण ने उनसे प्रार्थना समाप्त होने तक आत्मलिंग को थामे रखने का अनुरोध किया, लेकिन गणेश जी ने आत्मलिंग को धरती पर रख दिया। इसी बीच विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र हटा लिया, जिससे रावण ने सूर्य का प्रकाश देखा और खुद को ठगा हुआ महसूस किया। उसने आत्मलिंग को हटाने का बहुत प्रयास किया पर वह स्थापित हो चुका था। 

पास ही में घूम सकते हैं फोर्ट 

मुरुदेश्वर मंदिर के बाद मुरुदेश्वर फोर्ट घूमने जा सकते हैं। मंदिर के पास होने के कारण बड़ी संख्या में सैलानी यहां जाते हैं। इस फोर्ट के ऊपर से सामने सिर्फ नीले रंग का पानी ही पानी दिखाई देता है। इस फोर्ट का इतिहास विजयनगर साम्राज्य के राजाओं से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि टीपू सुल्तान के बाद किसी ने भी मुरुदेश्वर फोर्ट का जीर्णोद्धार नहीं कराया। फोर्ट का कुछ हिस्सा अब खंडहर में तब्दील हो चुका है।

कैसे पहुंचे

मुरुदेश्वर से मंगलुरु अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा 165 किलोमीटर दूर स्थित है। हवाई अड्डे से टैक्सी या बस से मुरुदेश्वर जा सकते हैं। रास्ते में हरे-भरे वातावरण और तटीय परिदृश्यों के मनोरम दृश्य देखने को मिलते हैं। मुरुदेश्वर में रेलवे स्टेशन भी है, जो मंगलुरु, बेंगलुरु और मुंबई से जुड़ा है। रेलवे स्टेशन से ऑटो-रिक्शा लेकर आसानी से मंदिर पहुंच सकते हैं। मुरुदेश्वर के लिए मंगलुरु, उडुपी और बेंगलुरु जैसे शहरों से नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं। कार से यात्रा करने पर एनएच-66 से सफर करते हुए अरब सागर के किनारे मनोरम दृश्यों का आनंद उठा सकते हैं।