यूपी विकास की असमान तस्वीर: नाबार्ड 2026-27 के लिए जारी रिपोर्ट, कृषि-MsME और सहकारिता क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था पर जोर
लखनऊ। नाबार्ड की वर्ष 2026-27 के लिए जारी उत्तर प्रदेश की सामाजिक एवं आर्थिक परिदृश्य रिपोर्ट में राज्य की सामाजिक-आर्थिक और वित्तीय विकास के मानकों पर गहरी क्षेत्रीय असमानताएं सामने आई हैं। जनसंख्या वितरण, कृषि पर निर्भरता, जोत के आकार और बैंकिंग पहुंच में अंतर के कारण प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में विकास की रफ्तार अलग-अलग सामने आई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि समावेशी कृषि और ग्रामीण विकास के लिए क्षेत्र-विशिष्ट नीतियां और संसाधनों का लक्षित आवंटन आवश्यक है।
रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के कुछ हिस्सों में ऋण प्रवाह, वित्तीय मध्यस्थता और आधारभूत संरचना मजबूत है, जबकि अन्य क्षेत्र अभी भी कृषि पर अत्यधिक निर्भर हैं और वहां संस्थागत ढांचा व बैंकिंग पहुंच कमजोर है। नाबार्ड ने ग्रामीण ऋण, सिंचाई, विपणन और आधारभूत ढांचे में केंद्रित हस्तक्षेप की सिफारिश की है।
रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी क्षेत्र कृषि सेवा केंद्र, नर्सरी, पावर टिलर, मत्स्य सहकारी समितियों, भंडारण गोदाम और ग्रामीण बाजार ढांचे में अग्रणी है। पश्चिमी क्षेत्र स्वास्थ्य सुविधाओं, डिस्पेंसरी, रेलवे संपर्क और मंडी यार्ड के मामले में बेहतर स्थिति में है।
इसके विपरीत बुंदेलखंड क्षेत्र स्वास्थ्य, कृषि और सहकारिता से जुड़े अधिकांश संकेतकों में सबसे निचले स्तर पर है, जिससे वहां विशेष विकास पैकेज की जरूरत बताई गई है। मध्य क्षेत्र कृषि इनपुट और मृदा परीक्षण में मध्यम स्थिति में है, लेकिन स्वास्थ्य और सहकारी संरचना को मजबूत करने की आवश्यकता है। पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों में जनसंख्या और क्षेत्रफल का बड़ा हिस्सा केंद्रित है, लेकिन वित्तीय और कृषि सूचकांक असमान विकास को दर्शाते हैं। बुंदेलखंड और पूर्वी यूपी में कृषि पर निर्भरता अधिक है, जहां छोटी और बिखरी जोतें उत्पादकता और आय क्षमता को सीमित करती हैं।
पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों में जमा, ऋण और क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात बेहतर है, जबकि पूर्वी यूपी और बुंदेलखंड में शाखा घनत्व कम, ऋण प्रवाह कमजोर और प्रति हेक्टेयर कृषि ऋण न्यूनतम है। बुंदेलखंड में बैंक शाखाओं की संख्या सबसे कम है। पूर्वी और बुंदेलखंड क्षेत्रों में ग्रामीण और बीपीएल आबादी का प्रतिशत अधिक है। अनुसूचित जाति की आबादी बुंदेलखंड और मध्य क्षेत्रों में अपेक्षाकृत ज्यादा पाई गई है।
पश्चिमी क्षेत्र में पक्के मकानों और बिजली की उपलब्धता सबसे अधिक है, जबकि बुंदेलखंड दोनों मामलों में पीछे है। स्वतंत्र शौचालय की उपलब्धता मध्य क्षेत्र में सबसे अधिक है, जबकि बुंदेलखंड और पूर्वी क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम है। गांवों का विद्युतीकरण लगभग सार्वभौमिक है, लेकिन गांव स्तर पर डाकघरों की उपलब्धता खासकर पूर्वी क्षेत्र में कम है। राज्य के सकल फसल क्षेत्र में पश्चिमी क्षेत्र की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत और पूर्वी क्षेत्र की लगभग 30 प्रतिशत है। बुंदेलखंड और मध्य क्षेत्र की हिस्सेदारी 16-16 प्रतिशत है।
पश्चिमी क्षेत्र कम जनसंख्या हिस्सेदारी के बावजूद कृषि विकास और भूमि उपलब्धता के मामले में आगे है। बुंदेलखंड का जनसंख्या हिस्सा 4.85 प्रतिशत है, लेकिन भौगोलिक कठिनाइयों के कारण वहां कृषि उत्पादकता सीमित है। पूर्वी क्षेत्र में दुग्ध सहकारी नेटवर्क (40.03 प्रतिशत) और मत्स्य सहकारी गठन (55.74 प्रतिशत) मजबूत है। पश्चिमी क्षेत्र 53.15 प्रतिशत मंडी यार्ड नियंत्रित करता है, जबकि बुंदेलखंड (1.03 प्रतिशत) और मध्य क्षेत्र (5.25 प्रतिशत) विपणन ढांचे में गंभीर कमी से जूझ रहे हैं।
भंडारण क्षमता भी पूर्वी क्षेत्र (55.52 प्रतिशत) में अधिक है, जबकि बुंदेलखंड (3.64 प्रतिशत) में गोदामों की कमी के कारण फसल नुकसान की आशंका बनी रहती है। प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) का जाल पूर्वी क्षेत्र (47.63 प्रतिशत) में व्यापक है, जबकि बुंदेलखंड (4.04 प्रतिशत) और पश्चिमी क्षेत्र (29.63 प्रतिशत) में इसे और मजबूत करने की जरूरत है। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि संतुलित और समावेशी विकास के लिए क्षेत्रवार प्राथमिकताओं के आधार पर नीतिगत हस्तक्षेप करना समय की मांग है, ताकि प्रदेश के सभी हिस्सों में समान विकास सुनिश्चित किया जा सके।
