संपादकीय: खामेनेई के बाद युद्ध

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Published By Monis Khan
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खामेनेई मारे गए, उनके के साथ ही देश के रक्षा मंत्री, सेना प्रमुख और कई सैन्य कमांडर समेत शासन से संबंधी कुछ महत्वपूर्ण लोग भी खेत रहे। खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता होने के नाते शासन व्यवस्था के केंद्र और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ थे। किसी युद्धरत देश के लिए हमले के पहले ही दिन इतनी बड़ी क्षति उसे घुटने पर ला देने के लिए बहुत है। सामान्य धारणा यह कि इससे ईरान कमजोर पड़ेगा और युद्ध जल्द ही खत्म हो जाएगा, पर फिलहाल ऐसा नहीं दिख रहा।

बेशक, ईरान के नेता असमंजस में होंगे कि इस युद्ध को कैसे झेला जाए, इसके व्यापक विनाश से कैसे बचा जाए, लेकिन उनके बयान और दूसरे तथ्य इस ओर इशारा करते हैं कि युद्ध शीघ्र समाप्त नहीं होगा। संभव है कि यह कुछ हफ्ते या महीनों लंबा खिंचे। ऐसे में यह बहुत से देशों को सीधे और कई को परोक्षत: बुरी तरह प्रभावित करेगा। सच तो यह है कि ईरान का इस्लामी शासन एक व्यक्ति पर निर्भर व्यवस्था नहीं है। 

सर्वोच्च नेता खामेनेई के मारे जाने के बाद उनकी जगह जो भी दूसरा धार्मिक नेता आयेगा उसके लिए राष्ट्रवाद के नाम पर जनसमर्थन हेतु युद्ध जारी रखना जरूरी होगा और इसके नाम पर उसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर का समर्थन भी मिलता रहेगा, जो पारंपरिक सेना के साथ-साथ काम करते हुए देश के भीतर और बाहर से आने वाले खतरों से शासन की रक्षा करने का विशेष दायित्व संभालती है।  

ट्रंप और नेतन्याहू की राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी यह युद्ध आवश्यक है। साल के अंत में नेतन्याहू को आम चुनाव का सामना करना है, उनका मानना है कि युद्ध से उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत होती है, उधर ट्रंप को टैरिफ मसले पर यूरोपीय देशों और कोर्ट द्वारा उनकी भद पिटने के बाद सुर्खरू होने के लिए राष्ट्रसुरक्षा के नाम पर युद्ध एक बेहतर सियासी उपाय है। दोनों की यह दलील बहुत खोखली है कि उनसे कमजोर ईरान उनके लिए खतरा है और यह आक्रमण किसी आशंकित खतरे के खिलाफ उठाया गया है, बल्कि यह एक सोचा-समझकर छेड़ा गया नियोजित युद्ध है। 

इसराइल और अमेरिका का आकलन है कि ईरान का इस्लामी शासन इस समय कमजोर स्थिति में है। वह गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा इसलिए उसे ध्वस्त करने के इस सुनहरे अवसर को गंवाया नहीं जाना चाहिए। अब जबकि खामेनेई मारे जा चुके हैं, तब उनके के लिए बेहतर अवसर है कि वह इसी दौर में अपने सभी मंसूबे पूरे कर लें, इसलिए भी वे युद्ध को तब तक खींचेंगे जब तक ईरान पूरी तरह तबाह होकर हथियार न डाल दे। 

पर सवाल यह भी है कि क्या वे अपनी मंशा में जल्द कामयाब होंगे, क्या उनकी ईच्छापूर्ति तमाम दूसरे देशों को संकट में नहीं डाल देगी? क्या शांति की भी कोई सूरत नजर आती है? खामेनेई की मौत के बाद अंतरिम कौंसिल कल परसों तक 88 धर्मगुरु के मत से नया सुप्रीम लीडर चुन ही लेंगे। अब देखना यह होगा कि ईरान का नवनिर्वाचित सुप्रीम लीडर तथा देश के अन्य सियासी गुट इस युद्ध के बारे में क्या रुख अपनाते हैं?