संपादकीय: इस आग की आंच 

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Published By Monis Khan
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अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के सैन्य ठिकानों और परमाणु केंद्रों पर किए गए संयुक्त हवाई हमलों ने न केवल मध्य पूर्व को युद्ध की आग में झोंक दिया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति के सामने एक अभूतपूर्व संकट भी खड़ा कर दिया है। ईरान के जवाबी मिसाइल हमलों ने इस संघर्ष को “सीधे टकराव” के उस स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां से वापसी का रास्ता फिलहाल थोड़ा मुश्किल नजर आता है।

यह हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान ‘मानवता’ और ‘शांति’ के आह्वान और उसकी प्रशंसा तथा स्वीकारोक्ति के ठीक बाद हुआ। जाहिर है यह किसी आकस्मिक प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि महीनों से तैयार एक सोची-समझी समीक्षित सैन्य रणनीति है। अमेरिका का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह ध्वस्त करना और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को अपने और अपने सहयोगियों के पक्ष में मोड़ना है, लेकिन ‘सत्ता परिवर्तन’ का ट्रंप प्रशासन का सपना खामनेई की मौत के बावजूद आसान नहीं है? 

इतिहास गवाह है कि थोपे गए बदलाव अक्सर लंबे और विनाशकारी गृहयुद्धों में तब्दील हो जाते हैं। इस युद्ध का सबसे भयावह पहलू आर्थिक है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है, अब एक युद्ध क्षेत्र बन चुका है, इसके बाधित होने का अर्थ है तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाना। हमारे लिए यह दोहरी मार का बायस बनेगा। अपनी जरूरत का 85-90 फीसद तेल आयात करने वाले भारत के लिए तेल महंगा होने का सीधा अर्थ है, परिवहन लागत में वृद्धि और खुदरा महंगाई। आयात बिल में वृद्धि और डॉलर की मांग मजबूत होने से रुपया कमजोर होगा, जिससे हमारा व्यापार घाटा बढ़ेगा। 

निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों में लगा रहे हैं, जिससे घरेलू बाजारों में अस्थिरता बढ़ेगी और इन धातुओं के दाम भी।  इस वैश्विक संकट के बीच भारत की भूमिका ‘सतर्क संतुलन’ की रही है। भारत ने न तो किसी पक्ष का अंधा समर्थन किया है और न ही तटस्थता के नाम पर चुप्पी साधी है। भारत का रुख संवाद और शांति पर आधारित है, जो उसके दीर्घकालिक सामरिक हितों की रक्षा के लिए अनिवार्य है। एक तरफ इजरायल के साथ हमारे रक्षा संबंध हैं, तो दूसरी तरफ खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों और ऊर्जा सुरक्षा की चिंता। ऐसे में भारत को संतुलित विदेश नीति पर कायम रखना होगा। 

समय की मांग है कि भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाए और एक मजबूत कूटनीतिक कवच तैयार करे। मध्य पूर्व का यह तनाव आने वाले महीनों में और गहरा सकता है। ऐसे में केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक लचीलापन और कूटनीतिक समझदारी ही भविष्य की दिशा तय करेगी। यह संघर्ष तीन देशों तक सीमित नहीं है, इसके चपेट में कई देश हैं। ऐसे में यह ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ की दिशा में एक जोखिम भरा कदम है, जो अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना और ऊर्जा राजनीति को फिर से परिभाषित करेगा। इस जंग की भीषण होती आग दिन-ब-दिन बढ़ी तो इसकी आंच तमाम देशों तक पहुंचेगी।