संपादकीय: अवसर और अनिश्चितता

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Published By Monis Khan
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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा तथाकथित ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ को अवैध ठहराए जाने और उसके बाद के घटनाक्रम ने वैश्विक व्यापार परिदृश्य में नया मोड़ ला दिया है। भारत–अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते पर बातचीत के स्थगन के निर्णय से भारत पर मिश्रित प्रभाव पड़ सकता है। पहला सकारात्मक पहलू यह है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अवसर बढ़े, अनिश्चितता कम हुई है। एकतरफा, मनमाने और प्रतिशोधात्मक टैरिफ अवैध घोषित किए जाने से भारतीय निर्यातकों, विशेषकर इस्पात, एल्युमिनियम, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और आईटी सेवाओं को राहत मिलेगी। 

पिछले वर्षों में अमेरिकी बाजार में अचानक शुल्क वृद्धि से भारतीय कंपनियों की लागत और प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हुई थी। अब व्यापार नियमों की पूर्वानुमेयता बढ़ने से निवेशकों और बाजारों में भरोसा लौट सकता है। दूसरी ओर, अंतरिम ट्रेड डील की वार्ता का टलना अल्पकालिक असमंजस पैदा करता है और व्यापार समझौते के तहत टैरिफ का स्पष्ट ढांचे के अभाव में निवेश निर्णय टल सकते हैं तथा शेयर बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार पहले ही 190 अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है, ऐसे में किसी व्यापक समझौते की अनुपस्थिति अवसरों को सीमित कर सकती है। भारत के लिए यह समय रणनीतिक पुनर्संतुलन का है। 

अमेरिकी अदालत के फैसले ने यह संकेत दिया है कि संस्थागत नियंत्रण और संतुलन अभी भी प्रभावी हैं। इससे भारत को वार्ता की मेज पर अधिक आत्मविश्वास मिल सकता है। विशेषकर रूसी तेल आयात जैसे मुद्दों पर, जहां अमेरिका ने अप्रत्यक्ष दबाव डाला था, भारत अब ऊर्जा सुरक्षा के तर्क को अधिक मजबूती से रख सकता है, हालांकि कुछ जोखिम भी हैं, अमेरिकी राजनीति में संरक्षणवाद की प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यदि भविष्य में फिर से उसके घरेलू दबावों के चलते शुल्क-नीति कठोर होती है, तो भारत की परेशानियां बढ़ सकती हैं, इसलिए अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकालिक रणनीति नहीं हो सकती। 

भारत इसके प्रति सचेत है और वह यूरोपीय संघ, खाड़ी देशों और इंडो-पैसिफिक साझेदारों के साथ समानांतर व्यापार समझौते आगे बढ़ा रहा है। क्षेत्रीय प्रभावों की दृष्टि से, आईटी और डिजिटल सेवाएं अपेक्षाकृत सुरक्षित दिखती हैं, क्योंकि वे टैरिफ से कम प्रभावित होती हैं, परंतु वस्त्र, ऑटो पार्ट्स और कृषि निर्यात अधिक संवेदनशील हैं। यदि व्यापक समझौता होता है, तो बौद्धिक संपदा अधिकार, डेटा लोकलाइजेशन और कृषि सब्सिडी जैसे जटिल मुद्दे सामने आएंगे, जहां संतुलन साधना आसान नहीं होगा। 

वर्तमान परिस्थिति भारत के लिए अवसर भी है। यदि अमेरिका में शुल्क-नीति न्यायिक नियंत्रण के अधीन रहती है, तो नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था को बल मिलेगा। भारत, जो बहुपक्षीय ढांचे और विश्व व्यापार संगठन की भूमिका पर जोर देता है, इस रुझान का लाभ उठा सकता है। भविष्य की दिशा इस पर निर्भर करेगी कि दोनों देश अंतरिम समझौते को व्यापक आर्थिक साझेदारी में कैसे बदलते हैं। सरकार को चाहिए कि वह घरेलू विनिर्माण क्षमता, निर्यात विविधीकरण और आपूर्ति शृंखला लचीलापन बढ़ाने पर ध्यान दे।