संपादकीय: जंग का बढ़ता दायरा

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Published By Monis Khan
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पश्चिम एशिया बारूद के ढेर पर है। इज़राइल द्वारा ईरान के सैन्य और परमाणु प्रतिष्ठानों पर व्यापक बमबारी के जवाब में ईरान की बहुस्तरीय प्रतिघात रणनीति ने संघर्ष को सीमित झड़प से क्षेत्रीय युद्ध की दिशा में धकेल दिया है। अब यह टकराव केवल दो देशों के बीच नहीं, बल्कि व्यापक त्रासदी का कारण बनता लग रहा है। दोनों पक्ष अपने-अपने नैरेटिव में आत्मरक्षा और निवारण का हवाला दे रहे हैं, किंतु परिणामस्वरूप युद्ध की परिधि बढ़ती जा रही है।

यह ठीक है कि यह युद्ध किंचित लंबा चले पर रूस यूक्रेन की तरह वर्षों तक नहीं चलेगा क्योंकि ईरान की परमाणु क्षमता और उसका क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क- हिज्बुल्लाह, हमास, हूती पहले जितने मजबूत नहीं है पर ईरान ने तीन-चरणीय जवाबी योजना के तहत सीधे हमलों के साथ-साथ क्षेत्रीय मोर्चों को भी सक्रिय करने की जो रणनीति बनाई है वह इस बहाने के साथ कि वह ‘आक्रामकता का जवाब’ दे रहा है, युद्ध को व्यापक बनाएगी। 

उसका दावा है कि अमेरिकी ठिकाने उसके वैध लक्ष्य हैं। खाड़ी देशों की स्थिति सबसे जटिल है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश ईरान के प्रभाव से चिंतित हैं, पर वे खुलकर युद्ध में कूदने से बचना चाहते हैं। खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य ऊर्जा अवसंरचना और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर सतर्क हैं। यदि संघर्ष फारस की खाड़ी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य तक फैलता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर तात्कालिक असर पड़ेगा। 

खाड़ी में काम करने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा और प्रेषण या रिमिटेंस भी दांव पर हैं। किसी एक पक्ष की खुली हिमायत दीर्घकालिक हितों को नुकसान पहुंचा सकती है इसलिए सभी पक्षों से संयम और संवाद की अपील करके कूटनीतिक रूप से भारत संतुलन की नीति पर चल रहा है। यह रुख इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत के इजराइल, ईरान और अरब देशों-तीनों से रणनीतिक संबंध हैं।

रक्षा-सुरक्षा के स्तर पर यह युद्ध ड्रोन, मिसाइल और साइबर क्षमताओं के नए आयाम दिखा रहा है। बहुस्तरीय वायु-रक्षा प्रणालियां, सटीक-मारक मिसाइलें और समुद्री नाकेबंदी की संभावनाएं भविष्य के युद्धों की झलक देती हैं। अमेरिका की नौसैनिक मौजूदगी और इजराइल की इंटेलिजेंस-ड्रिवन स्ट्राइक क्षमता एक ओर है, दूसरी ओर ईरान की असममित रणनीति-प्रॉक्सी नेटवर्क और मिसाइल भंडार है। यदि लेबनान, इराक या यमन के मोर्चे पूरी तरह सक्रिय हुए, तो संघर्ष का दायरा और बढ़ेगा।

इस बात की चर्चा जायज है कि यह ‘नए विश्व-क्रम’ की आहट है। संभव है कि यह टकराव क्षेत्रीय गठबंधनों को पुनर्परिभाषित करे-इजराइल और कुछ अरब देशों के बीच सामरिक समीकरण मजबूत हों, जबकि ईरान-रूस-चीन समीपता बढ़े। युद्ध की अवधि, जनमत, आर्थिक लागत और कूटनीतिक हस्तक्षेप-ये सभी कारक भविष्य में इसकी दिशा तय करेंगे। यह संघर्ष जितना सैन्य है, उतना ही मनोवैज्ञानिक और आर्थिक भी। 

बाजारों की घबराहट, तेल की कीमतें, शरणार्थी संकट और साइबर हमलों का जोखिम-सब मिलकर इसे वैश्विक चिंता का सबब बना रहे हैं। विश्व समुदाय के लिए चुनौती यह है कि वे संतुलित कूटनीति, ऊर्जा-विविधीकरण और नागरिक सुरक्षा की ठोस तैयारी के साथ आगे बढ़ें। क्योंकि इतिहास गवाह है युद्ध की आग सीमाओं में नहीं सिमटती।