संपादकीय: लारिजानी के बाद ईरान 

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रभावशाली सचिव अली लारिजानी की हत्या ईरान की रणनीतिक सोच और निर्णय-प्रक्रिया पर सीधा प्रहार है। इससे पहले अली खामेनेई की हत्या ने जो नेतृत्व शून्य पैदा किया था, लारिजानी उस खाली स्थान को आंशिक रूप से भर रहे थे। अब उनका जाना उस शून्य को और गहरा कर देता है। लारिजानी भले ही प्रत्यक्ष सैन्य कमांडर नहीं थे, लेकिन वे ईरान की युद्ध, कूटनीति और सुरक्षा नीति के केंद्रीय सूत्रधार थे। उनकी भूमिका विचारधारा और व्यवहारिकता के बीच संतुलन बनाने की थी। वे एक ऐसे नेता थे, जो कठोर बयानबाज़ी के बजाय दीर्घकालिक रणनीति पर जोर देते थे, इसलिए उनकी मौत संस्थागत अस्थिरता के रूप में सामने आएगा। 

सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल, जो युद्ध और कूटनीति से जुड़े निर्णयों का केंद्र है, अब नेतृत्वहीनता की स्थिति में आ सकती है। ऐसे में दो स्थितियां उभरती हैं- या तो कोई नया काबिल नेता उभरकर इस शून्य को भरे या फिर निर्णय-सत्ता धीरे-धीरे सैन्य प्रतिष्ठान, विशेषकर रिवोल्यूशनरी गार्ड के हाथों में अधिक केंद्रित हो जाए। लारिजानी के रहते ईरान ने ‘नियंत्रित टकराव’ की नीति अपनाई थी, जहां वह अमेरिका और इजराइल से सीधे युद्ध से बचते हुए दबाव बनाए रखता था, लेकिन अब यह संतुलन बिगड़ सकता है। यदि नेतृत्व अधिक कट्टर या सैन्य-केंद्रित हाथों में चला गया, तो ईरान की रणनीति अधिक आक्रामक हो सकती है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर ईरान का रुख़ और सख़्त हो सकता है। 

लारिजानी इस मार्ग को रणनीतिक दबाव के साधन के रूप में देखते थे। उनके बाद यदि अधिक कठोर नेतृत्व सामने आता है, तो इस जलडमरूमध्य को बाधित करने या उसकी धमकी देने की नीति और तेज हो सकती है, जिसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा, हालांकि ईरान की संस्थागत संरचना केवल एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है। रिवोल्यूशनरी गार्ड, सुरक्षा परिषद और धार्मिक नेतृत्व मिलकर सत्ता का ढांचा बनाते हैं, इसलिए ईरान पूरी तरह कमजोर हो जाएगा, यह मानना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन नेतृत्व के स्तर पर स्पष्टता की कमी से निर्णय लेने की गति और दिशा दोनों प्रभावित होंगी।

 लारिजानी जैसे संतुलित और अनुभवी नेता का विकल्प खोजना आसान नहीं होगा। शीर्ष नेतृत्व के कमजोर होने की स्थिति में सैन्य इकाइयों को अधिक स्वायत्तता मिल सकती है। इससे युद्ध के मैदान में अधिक आक्रामक और असंगठित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं, जो संघर्ष को और जटिल बना देंगी। इसके बावजूद ईरान ने अब तक यह दिखाया है कि वह वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, लेकिन उसका हवाई क्षेत्र लगातार हमलों के लिए खुला रहना यह बताता है कि उसकी सैन्य सुरक्षा अभी भी चुनौतीपूर्ण स्थिति में है। 
ऐसे में कोई भी नया नेता तुरंत निशाने पर आ सकता है, जिससे नेतृत्व संकट और गहरा सकता है। लारिजानी की मौत के निर्णायक मोड़ के बाद आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईरान इस संकट को संस्थागत मजबूती से संभालता है या फिर वह अधिक सैन्यवादी और आक्रामक रास्ते पर आगे बढ़ता है, जिसका असर पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक राजनीति पर पड़ेगा।