संपादकीय: विपक्ष का बिखराव
बिहार, ओडिशा और हरियाणा में हुए हालिया राज्यसभा चुनावों ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि विपक्षी एकजुटता अभी भी कागज़ी ज्यादा और ज़मीनी कम है। महागठबंधन और व्यापक विपक्षी मोर्चे की जो छवि प्रस्तुत की जाती रही है, उसमें दरारें खुलकर सामने आ गईं। विपक्ष अगर एकजुट रहता तो उसे एक-दो अतिरिक्त सीटें अवश्य मिल सकती थीं। क्रॉस वोटिंग और रणनीतिक चूक ने विपक्ष को नुकसान पहुंचाया। विशेषकर ओडिशा में कांग्रेस के विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग और बीजद के भीतर भी अनुशासनहीनता यह दिखाती है कि विपक्षी दलों के भीतर संगठनात्मक कमजोरी गहरी है।
कांग्रेस की रणनीति में शिथिलता के पीछे कई कारण दिखाई देते हैं- स्थानीय नेतृत्व की कमजोरी, विधायकों पर नियंत्रण की कमी और चुनावी गणित का सही आकलन न कर पाना। इसके विपरीत भाजपा ने महीनों पहले से तैयारी कर, अपने उम्मीदवारों की संख्या, समर्थन और संभावित क्रॉस वोटिंग की संभावनाओं का सूक्ष्म आकलन किया। यही कारण है कि सीमित संख्या में विधायकों के बावजूद उसने अपेक्षा से अधिक सफलता प्राप्त की।
ओडिशा में इस चुनाव ने संकेत दिया कि बीजद के भीतर दरारें उभर रही हैं, हालांकि पटनायक का हार्स ट्रेडिंग का आरोप राजनीतिक बयानबाजी ज्यादा है, परंतु क्रॉस वोटिंग की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि दलों के भीतर अनुशासन पूर्ववत नहीं रहा। एनडीए के खाते में 22 सीटों का जाना और विपक्ष के हिस्से में सात सीटों की कमी राज्यसभा की गणित को स्पष्ट रूप से सत्ता पक्ष के पक्ष में झुका देता है। इससे सरकार को विधायी कार्यों में अपेक्षाकृत कम बाधा का सामना करना पड़ेगा। महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में अब विपक्ष की भूमिका सीमित होती दिखेगी। भाजपा की यह सफलता केवल चुनावी प्रबंधन का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति का संकेत भी है।
इन परिणामों को आगामी चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों से जोड़ा कर भी देखा जाना उचित होगा। राज्यसभा के चुनावों ने यह संकेत दिया है कि विपक्ष की अंदरूनी कमजोरी अभी भी बनी हुई है, जबकि सत्तापक्ष अपनी रणनीतियों में पर्याप्त सफलता पा रहा है। इससे चुनावों में सत्ता पक्ष का मनोबल बढ़ेगा, लेकिन विधानसभा चुनावों में अंतिम निर्णय मतदाता स्थानीय मुद्दों के आधार पर ही करेंगे। साढ़े सत्रह करोड़ मतदाताओं के इस चुनावी महासमर में जो दल बेहतर संगठन, स्पष्ट नेतृत्व और ठोस मुद्दों के साथ मैदान में उतरेंगे, वही सफलता प्राप्त करेंगे।
इन राज्यों से लोकसभा और राज्यसभा के पर्याप्त सदस्य आते हैं, इसलिए यहां की जीत भविष्य के राष्ट्रीय समीकरणों को भी प्रभावित कर सकती है। जहां तक उपचुनावों का प्रश्न है, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, नगालैंड और त्रिपुरा की आठ सीटों के परिणाम सीमित प्रभाव वाले होंगे, परंतु वे राजनीतिक रुझानों का संकेत अवश्य देंगे। कुल मिलाकर राज्यसभा चुनावों ने विपक्ष के लिए यह स्पष्ट संदेश दिया है कि सिर्फ गठबंधन बना लेना पर्याप्त नहीं, उसे जमीन पर प्रभावी भी बनाना होगा। वहीं सत्ता पक्ष के लिए यह अवसर है, लेकिन उसे भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में अंतिम और कारसाज निर्णय हमेशा जनता के हाथ में होता है।
