संपादकीय:इस छूट के मायने
अमेरिका द्वारा ईरान से सीमित अवधि के लिए तेल खरीद की छूट विरोधाभासी है। जिस देश पर प्रतिबंध लगाकर उसके तेल राजस्व को रोकने की कोशिश की गई, उसी को अचानक “राहत” क्यों? यह निर्णय किसी उदारता से अधिक जटिल भू-राजनीतिक गणित का परिणाम है। लक्ष्य है ऊर्जा बाजार को तात्कालिक झटके से बचाना, आपूर्ति की कमी से कीमतों को काबू में रखना और समुद्र में फंसा तेल चीन की ओर न चला जाए इसकी व्यवस्था।
इसीलिए विरोधाभास से आंखें मूंदकर यह फैसला लेना पड़ा है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पश्चिम एशिया में तनाव, शिपिंग जोखिम और रूस-यूक्रेन युद्ध ने तेल गैस आपूर्ति को इतना संवेदनशील बना दिया कि इस मामले ऐसी रियायत देनी पड़ी। सीमित समय सीमा मात्र इसलिए ताकि यह “नियंत्रित वाल्व” की तरह काम करे। थोड़ी अतिरिक्त आपूर्ति आए, तेल बाजार में कीमतें नरम पड़ें, पर स्थायी ढील न बने, पर इससे कीमतें लंबे समय तक नियंत्रित नहीं रहने वाली।
समुद्र में फंसे लगभग 170 मिलियन बैरल तेल को बाजार तक लाने से अल्पकालिक राहत ही मिलेगी स्थायी समाधान नहीं। अगर भू-राजनीतिक तनाव जारी रहता है, तो यह राहत कुछ हफ्तों से लेकर कुछ महीनों से ज्यादा टिकाऊ नहीं होगी। ऊपर से ईरान का यह कहना कि उसके पास “सरप्लस तेल नहीं है”, संकेत देता है कि उपलब्ध अतिरिक्त आपूर्ति सीमित है या तो तेल पहले ही अनुबंधित है या ऐसे व्यवस्थागत ढांचे में है, जिसे तुरंत मोड़ा नहीं जा सकता। इससे वास्तविक आपूर्ति बनाम अपेक्षा के बीच अंतर पैदा होगा, जो कीमतों में अस्थिरता बनाए रख सकता है।
रूस पर प्रतिबंध और ईरान को छूट की दोहरी नीति का आरोप अमेरिका पर भले लगे, लेकिन व्यवहार में यह परिस्थिति-आधारित रणनीति है। रूस के मामले में उद्देश्य उसके युद्ध वित्त को बाधित करना था, वहीं ईरान के मामले में लक्ष्य तत्काल आपूर्ति झटके को कम करना और ईरानी तेल तक चीन की निर्बाध पहुंच को संतुलित करना है। यानी यहां सिद्धांत नहीं, हित-आधारित लचीलापन काम कर रहा है। भुगतान और लेन-देन की शर्तें महत्वपूर्ण होंगी।
व्यवहार में कई शर्तें वॉशिंगटन की रूपरेखा के अनुसार होंगी। अमेरिकी निगरानी में लेन-देन होने से डॉलर, यूरो या विशेष एस्क्रो व्यवस्थाएं अपनाई जा सकती हैं। “शैडो फ्लीट” पर लदे तेल के कारण बीमा, ट्रैकिंग और भुगतान जोखिम बढ़ते हैं, इसलिए खरीदार देशों को प्रशासनिक अनुपालन और जोखिम प्रबंधन में सावधानी रखनी होगी। भारत के लिए यह अवसर के साथ परीक्षा भी है। भारतीय रिफाइनरियां सीमित मात्रा में ईरानी ग्रेड्स, जो तकनीकी रूप से उपयुक्त और कभी-कभी प्रतिस्पर्धी कीमत पर मिलते हैं, उसका लाभ उठा सकती हैं, पर उन्हें अमेरिकी दिशा-निर्देशों, भुगतान चैनलों और बीमा शर्तों का पालन करना ही होगा।
रूस के तेल की तुलना में ईरानी तेल हर बार सस्ता हो, यह तय नहीं, पर लॉजिस्टिक्स, गुणवत्ता और अनुबंध शर्तों के आधार पर यह आकर्षक विकल्प बन सकता है। भारत को चाहिए कि वह इस मौके का उपयोग आपूर्ति विविधीकरण, रणनीतिक भंडार और नवीकरणीय ऊर्जा में तेज निवेश के साथ करे। क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा का स्थायी उत्तर बाजार की दया पर नहीं, नीतिगत दूरदृष्टि और आत्मनिर्भरता पर टिका होता है।
