संपादकीय: आग के सबक
पालम और इंदौर में हुई अग्नि त्रासदियां हमारे शहरी जीवन की असुरक्षित सच्चाइयों का आईना हैं। पालम में नौ और इंदौर में सात लोगों की मौत के यह आंकड़े नहीं, बुझती हुई जिंदगियों की दर्दनाक कहानियां हैं। हर ऐसी घटना के बाद शोक, मुआवजा और आश्वासन का क्रम चलता है, लेकिन इनसे हम कोई सबक नहीं लेते। चिंताजनक यह है कि इस बार आग की ये घटनाएं भीषण गर्मी के चरम से पहले ही सामने आ गईं। यह संकेत है कि समस्या केवल मौसम नहीं, बल्कि हमारी तैयारियों और व्यवस्था की कमी है।
शहरी इलाकों में ज्वलनशील सामग्री का अनियंत्रित भंडारण, बिजली के असुरक्षित कनेक्शन, संकरी गलियां और अग्नि सुरक्षा के प्रति उदासीनता-ये सभी मिलकर ऐसी त्रासदियों को जन्म देते हैं। पालम की घटना में रिहायशी इलाके में ही ज्वलनशील पदार्थों का संग्रह होना गंभीर प्रशासनिक चूक है। आखिर ऐसी गतिविधियों की अनुमति कैसे दी गई? स्थानीय निकायों की नियमित निगरानी का क्या हुआ? इंदौर की घटना में आधुनिक तकनीक जैसे ऑटोमैटिक लॉकिंग दरवाजे भी मौत का कारण बने।
विडंबना है कि सुविधा के लिए अपनाई गई तकनीक, संकट के समय जाल बन जाती है। हम तकनीक तो अपना लेते हैं, लेकिन उसके जोखिमों के प्रति जागरूक नहीं होते। इन दोनों घटनाओं में निवासियों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। घरों में ज्वलनशील सामग्री जमा करना, अग्निशमन के प्राथमिक उपायों की अनदेखी करना और आपातकालीन निकास की व्यवस्था न होना। ये सब लापरवाही के उदाहरण हैं, लेकिन नागरिकों की यह लापरवाही भी व्यवस्था की ढिलाई से ही जन्म लेती है, जहां नियमों का पालन न तो सख्ती से होता है और न ही जागरूकता का पर्याप्त प्रसार होता है।
सबसे दुखद है आपदा के समय हमारी तैयारी की पोल खुलना। फायर ब्रिगेड का देर से पहुंचना, उपकरणों का खराब होना और आवश्यक संसाधनों की कमी, ऐसी तकनीकी खामियां जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर हैं। यदि संकरी गलियों में पहुंचने के लिए छोटे फायर टेंडर या वैकल्पिक व्यवस्था होती, यदि हाइड्रोलिक सिस्टम दुरुस्त होता, बचाव के साधन उपलब्ध होते, तो शायद कुछ जानें बचाई जा सकती थीं।
बेशक कुछ लाख रुपये किसी परिवार के खोए हुए सदस्य की भरपाई कर सकते हैं? यह केवल प्रतीकात्मक राहत है, असली आवश्यकता है ऐसी घटनाओं को रोकने की। इन त्रासदियों से स्पष्ट है कि हमें सुधार की त्रिस्तरीय व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता है। पहला-प्रशासनिक स्तर पर, सख्त नियम, नियमित निरीक्षण और अवैध गतिविधियों पर तत्काल कार्रवाई।
दूसरा-तकनीकी स्तर पर, भवन निर्माण और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन करवना, अग्निशमन व्यवस्था का आधुनिकीकरण करना, जबकि तीसरा सुधार सामाजिक स्तर पर, नागरिकों में जागरूकता, जिम्मेदारी और आपातकालीन तैयारी की संस्कृति विकसित करना। ऐसे अग्निकांड प्राकृतिक नहीं मानवजनित आपदाएं हैं। इसलिए यदि इच्छा और व्यवस्था दोनों मजबूत हों, तो इन्हें रोका जा सकता है। पालम और इंदौर की आग हमें यही याद दिलाती है कि लापरवाही की कीमत हमेशा जान से चुकानी पड़ती है। अब भी समय है कि हम चेतें, वरना अगली खबर फिर किसी और शहर से आएगी और हम सिर्फ शोक और मुआवजे तक सीमित रह जाएंगे।
