Bareilly : टेढ़े-मेढ़े दांत...सुंदरता ही नहीं कम करते, चबाने और बोलने में भी होती है दिक्कत

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Published By Monis Khan
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बरेली, अमृत विचार। बच्चों और युवाओं में दांतों का टेढ़ा-मेढ़ा होना आम समस्या बनता जा रहा है। यह मौखिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता है। बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के डेंटल इंस्टीट्यूट साइंसेज के दंत विशेषज्ञों के अनुसार, सही समय पर पहचान और उपचार से इस समस्या को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

दांतों के टेढ़े-मेढ़े होने को चिकित्सा भाषा में मैलोक्लूजन कहा जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि टेढ़े दांत केवल चेहरे की सुंदरता को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि चबाने और बोलने में भी कठिनाई पैदा करते हैं। ऐसे दांतों की सफाई ठीक से नहीं हो पाती, जिससे कैविटी और मसूड़ों की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

आधुनिक दंत चिकित्सा में इसके कई प्रभावी उपचार उपलब्ध हैं। ब्रेसेस (तार वाले उपकरण) सबसे सामान्य और सफल तरीका माना जाता है, जो दांतों को धीरे-धीरे सही स्थिति में लाते हैं। बच्चों में जबड़े की सही वृद्धि के लिए विशेष उपकरण (फंक्शनल एप्लायंसेस) का भी उपयोग किया जाता है। 

दंत विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को 7-8 वर्ष की उम्र से ही ऑर्थोडॉन्टिक जांच करानी चाहिए, ताकि समस्या को शुरुआती अवस्था में ही पहचाना जा सके। विशेषज्ञों की सलाह है कि माता-पिता बच्चों की खराब आदतों जैसे अंगूठा चूसना या मुंह से सांस लेना समय रहते छुड़वाएं और नियमित रूप से दंत जांच कराते रहें।

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