काबिलियत का पैमाना डिजिटल क्वोशेंट बनना खतरनाक, सीएसजेएमयू में बोले डीएम
कानपुर। मोबाइल और इंटरनेट के अनियंत्रित उपयोग को युवाओं के लिए गंभीर खतरा बताते हुए जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि अब डिजिटल युग में काबिलियत का पैमाना "डीक्यू" (डिजिटल क्वोशेंट) बनता जा रहा है। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) में आयोजित "फाइटिंग डिजिटल एडिक्शन" कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि तकनीक का संतुलित उपयोग ही सफलता की कुंजी है।
बीसवीं सदी में जहां आईक्यू (इंटेलिजेंस क्वोशेंट) और बाद में ईक्यू (इमोशनल क्वोशेंट) को महत्व मिला, वहीं अब डिजिटल युग में डी क्यू तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय "अटेंशन इकॉनमी" का है, जहां बड़ी तकनीकी कंपनियां उपयोगकर्ताओं का ध्यान बनाए रखने के लिए मनोविज्ञान और तकनीक का उपयोग करती हैं।
मोबाइल एप और सोशल मीडिया इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि उपयोगकर्ता बार-बार उन्हें खोलें, जिससे मस्तिष्क में डोपामिन स्राव होता है और लत विकसित होती है। जिलाधिकारी ने युवाओं से डिजिटल अनुशासन अपनाने की अपील करते हुए कहा कि तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है, बल्कि उसका संतुलित और नियंत्रित उपयोग जरूरी है।
उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा के सफल अभ्यर्थियों का उदाहरण देते हुए कहा कि अधिकांश ने तैयारी के दौरान सोशल मीडिया से दूरी बनाई। कार्यक्रम में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सृजन श्रीवास्तव ने बताया कि डिजिटल लत मनोवैज्ञानिक समस्या भी है, जिससे निपटने के लिए जागरूकता, आत्मनियंत्रण तथा परिवार और शिक्षकों की भूमिका अहम है।
उन्होंने तीन स्तरीय हस्तक्षेप मॉडल के तहत छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों को जोड़कर समाधान पर जोर दिया। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में 20 से 40 प्रतिशत युवा इंटरनेट एडिक्शन के जोखिम में हैं, जबकि कुछ अध्ययनों में कॉलेज छात्रों में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से अधिक पाया गया है। अत्यधिक डिजिटल उपयोग का संबंध अवसाद, चिंता, तनाव और नींद संबंधी समस्याओं से भी जुड़ा है।
