रेवड़ियों की राजनीति और बढ़ता आर्थिक संकट, लोकतंत्र में विकास की कीमत कौन चुकाएगा?

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Published By Muskan Dixit
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भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में नीतियों का फोकस तेजी से फ्रीबीज यानी मुफ्त योजनाओं की ओर हुआ है, लेकिन इस मॉडल की कीमत क्या है? क्या यह वास्तव में गरीबों के सशक्तिकरण का रास्ता है या फिर अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला एक दीर्घकालिक जोखिम?

राजेश जैन, वरिष्ठ पत्रकार-

भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में नीतियों का फोकस तेजी से फ्रीबीज यानी मुफ्त योजनाओं की ओर हुआ है, लेकिन इस मॉडल की कीमत क्या है? क्या यह वास्तव में गरीबों के सशक्तिकरण का रास्ता है या फिर अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला एक दीर्घकालिक जोखिम?

MUSKAN DIXIT (63)

भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में पिछले एक दशक में एक बड़ा बदलाव आया है। नीतियों का फोकस तेजी से फ्रीबीज यानी मुफ्त योजनाओं की ओर हुआ है। कभी सामाजिक सुरक्षा के औजार के रूप में देखी जाने वाली ये योजनाएं अब चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुकी हैं। नकद हस्तांतरण, मुफ्त राशन, महिलाओं के लिए मासिक सहायता, बिजली-पानी सब्सिडी-इन सबने मिलकर एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें चुनाव जीतने का गणित सीधे ‘सीधे लाभ’ से जुड़ गया है, लेकिन इस मॉडल की कीमत क्या है? क्या यह वास्तव में गरीबों के सशक्तिकरण का रास्ता है या फिर अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला एक दीर्घकालिक जोखिम? यही इस पूरे विमर्श का मूल प्रश्न है।
फ्रीबीज की राजनीति का सबसे बड़ा उभार 2020 के बाद देखने को मिला, जब विभिन्न राज्यों में चुनावी घोषणाओं में नकद सहायता और मुफ्त सेवाओं का अनुपात तेजी से बढ़ा। पश्चिम बंगाल की ‘लक्ष्मीर भंडार’ योजना, मध्य प्रदेश की ‘लाडली बहना’, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में महिलाओं के खातों में सीधे पैसे भेजने की योजनाएं- इन सबने एक नया ट्रेंड सेट किया। अब स्थिति यह है कि चुनावी घोषणापत्र ‘विकास के वादों’ से ज्यादा ‘सीधे पैसे और सुविधाओं’ के इर्द-गिर्द घूमने लगे हैं। राजनीतिक दलों के बीच एक तरह की प्रतिस्पर्धा बन गई है कि कौन ज्यादा देगा, कौन ज्यादा तेज़ी से देगा और किस वर्ग को सीधे लाभ पहुंचाएगा। इस प्रतिस्पर्धा ने लोकतांत्रिक राजनीति को ‘नीतिगत बहस’ से हटाकर ‘आर्थिक ऑफर’ की दिशा में मोड़ दिया है।

फ्रीबीज की राजनीति का सबसे अहम पहलू है- महिला मतदाताओं को केंद्र में रखना। लगभग हर राज्य में महिलाओं के लिए अलग योजनाएं बनाई जा रही हैं, जिनमें हर महीने 1000 से 2500 रुपये तक की नकद सहायता दी जा रही है। इस रणनीति के पीछे स्पष्ट गणित है। कई राज्यों में महिला वोटरों की संख्या पुरुषों के बराबर या उससे अधिक हो चुकी है। तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में महिलाओं का वोट प्रतिशत 50 प्रतिशत से ज्यादा है। ऐसे में यह वर्ग चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है।

इन योजनाओं का सामाजिक असर भी दिखा है। कई गरीब परिवारों में महिलाओं के हाथ में पहली बार नियमित नकदी आई है, जिससे उनका घरेलू निर्णयों में प्रभाव बढ़ा है, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या यह वास्तविक सशक्तिकरण है या सिर्फ आर्थिक निर्भरता का नया रूप?

फ्रीबीज की सबसे बड़ी आलोचना इसके आर्थिक प्रभाव को लेकर है। आंकड़े बताते हैं कि कई राज्यों में इन योजनाओं का खर्च कुल राजस्व का 30 से 40 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसका सीधा मतलब है कि सरकारों के पास विकास कार्यों के लिए पैसा कम बच रहा है।

मध्य प्रदेश में लाडली बहना और अन्य सब्सिडी योजनाओं पर सालाना करीब 50 हजार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। तेलंगाना में चुनावी वादों को पूरा करने के लिए हर साल लगभग एक लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। पंजाब में स्थिति और गंभीर है, जहां आय और खर्च के बीच बड़ा अंतर है और बजट संतुलन बिगड़ चुका है। इसका असर यह हो रहा है कि सरकारें लगातार कर्ज ले रही हैं। कर्ज-से-जीएसडीपी अनुपात बढ़ रहा है, जिससे भविष्य में वित्तीय संकट का खतरा बढ़ जाता है। छोटे राज्यों में तो स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि वेतन और पेंशन देने में भी दिक्कत आने लगी है।

जब बजट का बड़ा हिस्सा फ्रीबीज पर खर्च होता है, तो सबसे पहले असर विकास परियोजनाओं पर पड़ता है। सड़क, पुल, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य- ये सभी क्षेत्र धीरे-धीरे फंड की कमी से प्रभावित होते हैं। राजस्थान जैसे राज्यों में सड़क और पानी परियोजनाओं का बजट कम करना पड़ा। महाराष्ट्र में कुछ पारंपरिक योजनाएं बंद करनी पड़ीं। इसका मतलब यह है कि तत्काल राजनीतिक लाभ के लिए दी जा रही राहत, दीर्घकालिक विकास को कमजोर कर रही है। यह स्थिति एक ‘ट्रेड-ऑफ’ पैदा करती है- क्या सरकारें आज राहत दें या भविष्य के लिए निवेश करें? अगर यह संतुलन बिगड़ता है, तो आने वाले वर्षों में रोजगार, औद्योगिक विकास और आर्थिक वृद्धि पर गंभीर असर पड़ सकता है। 

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