अंबेडकर दिवस : समानता का सपना और आज का समय

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Published By Virendra Pandey
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डॉ. सुभाष चंद्रा
डॉ. सुभाष चंद्र, रुहेलखंड यूनिवर्सिटी बरेली

 

महान समाज सुधारक, अर्थशास्त्री, विधि वेत्ता, विचारक, भारतीय संविधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर ज्ञान के महर्षि थे। वेवरले निकोलस नाम के पत्रकार ने 1914 में उनकी गणना भारत के प्रथम श्रेणी के विद्धानों में की थी। वे निपुण राजनीतिज्ञ थे, परंतु उनकी राजनीतिक योग्यता में विद्वता की स्पष्ट झलक थी। राजनीति में कदम-कदम पर बेईमानी दिखने पर भी उन्होंने सत्य का साथ कभी नहीं छोड़ा। वे अभिमान से कहा करते थे कि मैनें कभी गंदी राजनीति नहीं की। वे अहिंसा के प्रवर्तक थे। उनका यह स्पष्ट मत था कि बिना सत्य के अहिंसा का कोई अर्थ नहीं है। नींद में सुन्न पड़े रहना अहिंसा नहीं कहलाता। अहिंसा हो तो शेर की। उन्हें बलवान की अहिंसा पसंद थी, इसलिए उन्होंने बर्ट्रांड रसेल की अहिंसा का कौतुक किया है। 

महाड़ सत्याग्रह के समय उनके साथ बहादुर सैनिक होते हुए भी तथा अपने ऊपर हिंसक हमला होने पर भी उन्होंने अपने अनुयायियों को हिंसक प्रतिकार से दूर रहने का आदेश दिया था। डॉ. अम्बेडकर वाकपटुता के धनी थे। साधारण व्यक्तियों से बातचीत करने की उनकी सामान्य भाषा और विद्वानों के समक्ष विद्वतापूर्ण भाषा। जनसभा में बोलने के लिए जब वे खड़े होते, तो लाखों लोगों को खामोश कर देने वाली मोहनी उनकी वाणी में थी, लेकिन जब वे संसद भवन में सांसदों के सामने बोलते तो धुरंधर सभा भी मोहित होकर घंटों उनका भाषण सुनती और उनकी वाणी के प्रभाव के कारण गर्दन हिलाती। 

उनकी संगठन शक्ति और कुशलता के बारे में तो प्रश्न ही नहीं उठ सकता था। पहले उन्होंने अस्पृश्यों में आत्मविश्वास जगाने और उसका बोध पैदा कर देने वाले आंदोलनों को चलाया। खेतिहर मजदूरों एवं मिल मजदूरों के संगठन स्थापित किए। लोगों के विचारों को झकझोरने के लिए अखबार चलाए। विरोधियों की आलोचनाओं का सामना किया। स्वाभिमान एवं स्वावलंबन, लाचारी से न जीने का निश्चय, अपना रास्ता खुद खोज निकालने का फैसला, जो भी दिशा दिखे उससे अपना उत्कर्ष करने का निश्चय, शिक्षा और आर्थिक तथा सामाजिक समता पाने के लिए संघर्ष- यह सारी सफलताएं अंबेडकर के आंदोलन की विशेषताएं थीं।

अंबेडकर केवल बातूनी विचारक नहीं थे। वे किसी भी सुधार को किस तरह से अमल में लाया जाए, इस पर भी खूब सोचते थे। उन्होंने अंतर्जातीय विवार को प्रोत्साहन दिया तथा खुद भी अंतर्जातीय विवाह किया। वे सारे भारतीय अस्पृश्यों एवं महिलाओं की भलाई के बारे में सोचते थे। श्रम मंत्री बनते ही उन्होंने इस अवसर का उपयोग करते हुए मजदूरों के कल्याण के लिए कानून बनवाए। वे अपने आपको पहले भारतीय मानते थे और आखिर में भी भारतीय ही समझते थे। अपनी इस भारतीयता पर उन्होंने धार्मिकता का पुट कभी नहीं चढ़ने दिया। उनके रोम-रोम में प्रजातंत्र की प्रक्रति समायी हुई थी। 

आपको कभी भी किसी पद की लालसा नहीं रही और न ही संपत्ति का मोह रहा। आपका व्यक्तित्व तूफान के समान था। आपने हिंदू समाज को सुधारने के लिए अपने विचारों द्वारा अथक प्रयास किए। उन्होंने प्रजातंत्र को जीवन का मूल्य बनाकर समाज को उन्नत करने का भरसक प्रयास किया तथा राजनीतिक प्रजातंत्र को सामाजिक प्रजातंत्र बनाने का सपना चित्रित किया था। आपने हजारों दरारों से भरे भारत रूपी इमारत का पुनरूत्थान करने का प्रयत्न किया था तथा देश को एक सूत्र में पिरोने के लिए संविधान रूपी तोहफा दिया। अस्तु इसको संभालने का पूर्ण दायित्व हमारा है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)