Bareilly : सोना-चांदी की चमक बढ़ाने वाले हाथ अब कर रहे बेगारी
युद्ध का असर… दामों में उतार-चढ़ाव के चलते मंदी ने कारीगरों के सामने पैदा किया संकट
बरेली, अमृत विचार। कभी अपनी मेहनत और महीन कारीगरी से सोना-चांदी को चमक देने वाले हाथ आज मजबूरी में ई-रिक्शा चला रहे हैं या दिहाड़ी मजदूरी कर रहे हैं। खाड़ी में युद्ध, बढ़ती महंगाई और सर्राफा बाजार में उथल-पुथल ने ज्वेलरी कारीगरों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। हालात यह हैं कि कभी महीने में एक लाख रुपये तक कमाने वाले कारीगर अब परिवार पालने के लिए बेगारी कर रहे हैं।
आभूषण सप्लायर आनंद रस्तोगी ने बताया कि सर्राफा बाजार में सुस्ती साफ नजर आ रही है। ग्राहक अब बेहद जरूरत या मजबूरी में ही जेवर खरीद रहे हैं, जिससे कारीगरों के पास काम की भारी कमी हो गई है। कारीगरों के काम में करीब 50 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। सोने के दामों में लगातार उतार-चढ़ाव ने निवेशकों को भी असमंजस में डाल दिया है। बरेली में अधिकांश कारीगर पश्चिम बंगाल, खासकर कोलकाता से आते हैं। काम की कमी के चलते तमाम कारीगर घर लौट चुके हैं, जो बचे हैं वे किसी तरह शहर में टिके हुए हैं। कई कारीगर ई-रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं, तो कुछ दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं।
कई बार मजदूरी भी नहीं मिलती
कोलकाता के रहने वाले कारीगर राजू मलिक ने बताया कि पहले उन्हें नियमित रूप से मेहनताना मिल जाता था, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि कई बार मजदूरी भी नहीं मिलती। ऐसे में वे वेस्ट सोना (पुराना या बचा हुआ सोना) इकट्ठा कर उसे बेचकर गुजारा करने की कोशिश कर रहे हैं। यह स्थिति उनके लिए आर्थिक ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी बेहद कठिन है। जब तक बाजार में स्थिरता नहीं आएगी और दाम नियंत्रित नहीं होंगे, तब तक कारीगरों की स्थिति में सुधार मुश्किल है। उन्होंने कहा कि अब मध्यम वर्ग के लोग सोना से दूरी बना रहे हैं तो निवेशक असमंजस में है और निवेश नहीं कर रहे हैं।
ई-रिक्शा चला रहे... दुकान पर कर रहे नौकरी
आभूषण कारीगर अमृत रस्तोगी बताते हैं कि एक समय वह एक लाख रुपये से अधिक हर माह कमा लेते थे। आज उन्हें अपना घर चलाना मुश्किल हो गया है। परेशान होकर बटलर प्लाजा के पास किचन कॉर्नर लगा कर परिवार पाल रहे हैं। संतोष कुमार भी कारीगरी में अच्छा पैसा कमा लेते थे। संकट में वह कपड़े की दुकान पर 20 हजार रुपये प्रति माह की नौकरी कर रहे हैं। सिकंदर ने बताया कि वह 80 हजार से एक लाख रुपये हर माह कमा लेते थे, लेकिन अब काम मिलना न के बराबर हो गया। मजबूरी में ई-रिक्शा चला रहे हैं।
