सेहतमंद समाज और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका
पृथ्वी का लगभग संपूर्ण मानव समाज किसी-न-किसी धर्म से जुड़ा हुआ है। मनुष्य का स्वास्थ्य, आचरण एवं व्यवहार तथा स्वास्थ्य से जुड़ी सामाजिक मान्यताएं कहीं-न-कहीं धार्मिक आस्था पर आधारित हैं। मंदिर, मठ, गुरुद्वारा, मस्जिद, गिरजाघर, आदि जैसे धार्मिक स्थल न केवल व्यक्ति की पूजा के पवित्र स्थान होते हैं, बल्कि वे समुदाय के लोगों की दैनिक दिनचर्या से जुड़े उनके सामाजिक, सार्वजनिक पहलुओं का आधार भी होते हैं। विश्वभर में प्रचलित अनेक धार्मिक संस्थाओं के बीच कुछ-न-कुछ समानता अवश्य देखी जाती है। लोगों का अपने धार्मिक स्थलों के साथ पारंपरिक अथवा औपचारिक तौर पर गहरा जुड़ाव देखा जाता है। लोगों का व्यक्तिगत अथवा समुदाय का सामूहिक स्वास्थ्य और बीमारी से जुड़े आचरण उनकी धार्मिक संस्थाओं की शक्ति से प्रभावित होने के संकेत मिलते हैं। - डॉ कृष्णा नंद पांडे
विगत वर्षों में सामान्य स्वास्थ्य को बढ़ावा देने तथा रोगों से बचने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों और आस्था से जुड़े अनेक समूहों एवं अन्य धार्मिक संस्थाओं के बीच एक सहयोग देखा जाता था। परंतु सरकारों द्वारा, खासकर कोविड-19 जैसे स्वास्थ्य संकट के दौरान मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर जैसे पवित्र पूजा स्थलों के माध्यम से न केवल रोगियों, बल्कि समुदाय के सभी पीड़ित व्यक्तियों की आपातकालीन आवश्यकताओं की पूर्ति करने, आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध कराने, मौत की कगार पर खड़े रोगियों को तत्काल अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था, ऑक्सीजन सिलेंडरों को उपलब्ध कराने जैसी अनेक गतिविधियों में सहायता प्रदान की गई।
इनके अलावा, स्थानीय रूप से व्याप्त रोगों पर नियंत्रण रखने के लिए धर्म एवं आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति शुरुआती जागरूकता उत्पन्न करने, रोग की समस्या से जुड़ी अवधारणाएं को दूर करने अथवा उन्हें मिटाने तथा रोग एवं रोगी की पहचान करने में समुदाय के लोगों की भागीदारी को बढ़ाने में बढ़-चढ़ कर सहायता प्रदान की जाती है।
कोविड-19 महामारी के दौरान अनेक धार्मिक संस्थाओं द्वारा बेघर, बेरोजगार, पीड़ित-लाचार व्यक्तियों के लिए नि:शुल्क भोजन, आवास एवं विकास पोषण की व्यवस्था की गई थी, जो उनकी सेवा समर्पित भावना के अद्वितीय उदाहरण हैं। टीबी और कई प्रकार के अन्य संचारी रोगों की स्थिति में भी धार्मिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
समुदाय में व्याप्त कुछ प्रकोपों को रोकने एवं उन पर काबू पाने में सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के संचालन में धार्मिक संस्थाओं की भूमिका पर कुछ अध्ययन किए गए हैं, परंतु सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए संचालित कार्यक्रमों में पूजा स्थलों की भूमिका की जांच पर प्रामाणिक जानकारी का अभाव रहा है। इन पहलुओं पर जानकारी समुदाय आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को बढ़ाने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने के साथ-साथ समावेशी स्वास्थ्य सम्मत प्रणालियां विकसित करने में सहायक होगी। इसमें मौजूदा सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली समावेशी स्वास्थ्य सेवाएं सम्मिलित हैं। समावेशी स्वास्थ्य एक ऐसा दृष्टिकोण है, जो गंभीर अभाव और गहरे सामाजिक बहिष्कार के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली अत्यधिक स्वास्थ्य असमानताओं को रोकने और उनका समाधान करने के लिए बनाया गया है।
यह मूल रूप से अंत: विषयक होता है, जिसमें व्यापक पेशेवर और व्यक्तिगत अनुभव वाले विशेषज्ञों के योगदान की आवश्यकता होती है। विश्व के अधिकांश लोग किसी-न-किसी धर्म के अनुयायी होते हैं। प्रायः लोग नियमित रूप से अथवा विशेष अवसरों पर धार्मिक स्थलों पर एकत्रित होते हैं। ये धार्मिक स्थल सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रयासों के माध्यम से समुदाय के लोगों में रोगों पर नियंत्रण रखने के प्रति न केवल जागरूकता पैदा कर सकते हैं, बल्कि विकट स्थितियों में यथासंभव रोगियों और उनके परिजनों को सहायता भी उपलब्ध कराने में सक्षम होते हैं। रोगियों की नकारात्मक मनोदशा को दूर करने, उन्हें भावनात्मक और मानवीय सहायता प्रदान करने, समुदाय के साथ अनुकूल संबंधों को बढ़ावा देने के माध्यम से उनमें आत्मविश्वास पैदा करने में भी सहायता प्रदान करते हैं।
व्यक्तियों में हेल्दी बिहेवियर यानी स्वास्थ्य संवर्धक आदतें विकसित करने, रोगों की व्यापकता फैलने से रोकने के लिए व्यक्तियों को बेहतर जानकारी उपलब्ध कराने, समुदाय के लोगों तथा स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणालियों के बीच विश्वासपूर्ण संबंध विकसित करने के साथ-साथ स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच से दूर सुदूर स्थित समुदायों को भी सहायता प्रदान करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के अधिकारियों को जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सहायता प्रदान करने हेतु प्रेरित करने में भी इन धार्मिक स्थलों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कुल मिलाकर ये सारी गतिविधियां समुदाय के लोगों को रोग से संबंधित गंभीर परिस्थितियों से निपटने के प्रति आत्मविश्वास पैदा करने तथा उनकी क्षमता को बढ़ाने में धार्मिक स्थलों का एक महत्वपूर्ण योगदान होता है।
