परंपरा, बाजार और बदलती पहचान
शिक्षका
भारत की सांस्कृतिक संरचना में त्योहारों का स्थान केवल आनंद और उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि वे समाज की ऐतिहासिक स्मृति, आर्थिक संरचना, प्रकृति के साथ संबंध और मानवीय संवेदनाओं के गहरे ताने-बाने से जुड़े होते हैं। यहां त्योहार जीवन के हर पहलू को स्पर्श करते हैं— खेती, ऋतु परिवर्तन, पारिवारिक संबंध, सामूहिकता और आस्था, लेकिन वर्तमान समय में यह प्रश्न गंभीरता से उठाया जाने लगा है कि क्या हमारे पारंपरिक त्योहार अपनी मूल आत्मा से दूर होते जा रहे हैं? क्या उन पर एक प्रकार का ‘कल्चरल अटैक’ हो रहा है, जो धीरे-धीरे उनकी असल पहचान को बदल रहा है?
‘कल्चरल अटैक’ शब्द भले ही आक्रामक प्रतीत होता हो, लेकिन इसका आशय किसी एक वर्ग या समूह पर आरोप लगाना नहीं है। यह उस धीमी, सूक्ष्म और कई बार अनदेखी प्रक्रिया की ओर संकेत करता है, जिसके माध्यम से परंपराएं अपने मूल सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ से हटकर नए अर्थ ग्रहण करने लगती हैं। यह परिवर्तन कभी स्वाभाविक होता है, तो कभी सुनियोजित आर्थिक और वैचारिक प्रभावों का परिणाम भी हो सकता है।
भारतीय त्योहारों की जड़ें मुख्यतः कृषि और प्रकृति से जुड़ी रही हैं। देश का अधिकांश समाज सदियों तक कृषि-आधारित रहा है, इसलिए फसल, मौसम और भूमि के साथ उसका गहरा रिश्ता रहा। फसल कटने की खुशी, नई बुवाई की शुरुआत, वर्षा के आगमन का स्वागत— ये सब त्योहारों के माध्यम से व्यक्त होते थे। इन उत्सवों में किसान केंद्र में होता था, क्योंकि वही अन्न का उत्पादक था और वही समाज की जीवन-रेखा को बनाए रखता था। ऐसे त्योहारों में आडंबर कम और सहभागिता अधिक होती थी। लोग मिलकर गाते-बजाते, सामूहिक भोज करते और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते थे।
जैसे-जैसे समाज में शहरीकरण बढ़ा, औद्योगिकीकरण हुआ और बाजार की ताकतें मजबूत हुईं, त्योहारों का स्वरूप भी बदलने लगा। अब त्योहारों को केवल सांस्कृतिक या सामाजिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक अवसर के रूप में भी देखा जाने लगा। बाजार ने त्योहारों को उपभोग से जोड़ दिया— जहां खरीदारी, सजावट और प्रदर्शन को प्रमुखता मिलने लगी। त्योहारों के साथ ‘ऑफर’, ‘डिस्काउंट’ और ‘शुभ खरीदारी’ जैसे विचार जुड़ गए, जिसने उनके मूल स्वरूप को प्रभावित किया।
यह बदलाव केवल बाहरी नहीं है, बल्कि मानसिकता में भी आया है। पहले त्योहारों का अर्थ था- मिलना-जुलना, साझा करना और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना। अब कई जगहों पर यह प्रतिस्पर्धा का रूप ले चुका है। किसने कितना खर्च किया, किसने क्या खरीदा, किसका आयोजन कितना भव्य था। इस प्रक्रिया में त्योहारों की आत्मा कहीं पीछे छूटती चली गई।
त्योहारों पर ‘कल्चरल अटैक’ की चर्चा करते समय एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है— लोक परंपराओं का हाशिए पर जाना। भारत में हर क्षेत्र की अपनी विशिष्ट परंपराएं रही हैं, जो स्थानीय जीवनशैली, भाषा और संसाधनों से जुड़ी होती थीं, लेकिन आज मीडिया और बाजार के प्रभाव में एक प्रकार की सांस्कृतिक एकरूपता (cultural homogenization) देखने को मिल रही है। कुछ खास त्योहारों और उनके खास तरीकों को पूरे देश में मानक बना दिया गया है, जिससे स्थानीय विविधताएं धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। (यह लेखिका के निजी विचार हैं)
