भक्ति का आनंद 

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Published By Anjali Singh
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भक्ति क्या है? भक्ति में आनंद कैसे आता है? भक्तों के सदा खुश रहने का कारण कया है? भक्ति एक समर्पण है , जहां पर भक्त की नहीं, भगवान की चलती है, भक्ति मार्ग पर आपको खुद अपने को तराशना और परखना है कि तलवार के जैसे मार्ग पर आप चल पाएंगे, कहीं आप साधना की कठिनाइयों से घबरा तो नहीं जाएंगे? 

आपकी इसी दृढ़ इच्छा शक्ति को परखने लिए बार-बार गुरु और भगवान परीक्षा लेते हैं, इसीलिए यह सब तो वह ही बता सकता है, जिसने भक्ति की हो या खुद भक्ति करके जानो। भक्ति का आनंद भक्ति करके ही पाया जा सकता है। भक्त के खुश रहने का कारण यह है कि वह अपना सबकुछ यानी सुख- दु:ख सब अपने भगवान को अर्पित कर देता है, उनकी इच्छा पर सबकुछ छोड़ देता है।– सुधांशु आचार्य

यही कारण है कि उसको सुख, दु:ख, धूप, छांहों नहीं हरा पाती और वह हर हाल में सदा खुश रहता है, क्योंकि वह हर चीज के पीछे भगवान की इच्छा मानता है। यह निष्काम स्थिति तब आती है, जब भक्त पूर्ण रूप से कामना रहित हो जाता है, उसके मन में किसी तरह की कोई कामना नहीं रहती, जब मन से कामनाओं का अंत हो जाता है। तब ही भगवान का साक्षात्कार हो जाता है।

भगवान खुद अपने भक्त का ध्यान रखने लगते हैं, जिस तरह एक मां अपने बच्चे का ध्यान रखती है, वह उसको एक पल के लिए अकेला नहीं छोड़ती, लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, वह खुद सारे निर्णय लेने लगता है, धीरे-धीरे मां उसे उसके हाल पर छोड़कर निश्चिंत हो जाती है और बच्चा अपने भले बुरे के लिए खुद जिम्मेदार होता है। उसी तरह जब हम भगवान का साथ छोड़ देते हैं, तो भगवान भी हमारा साथ छोड़ देते हैं।

इसलिए भगवान के सामने सदैव बच्चा बने रहो, इसी में हमारा फायदा है। भगवान पर पूरी तरह अपना बिश्वास बनाएं रखो, अपने विश्वास को किसी भी स्थिति में कमजोर मत पड़ने दो, यकीन रखो वह जो करेगा,  अच्छा ही करेगा, यही भरोसा आपको कहीं कमजोर नहीं पड़ने देगा।