बज्जिकांचल की बसेरी कला और कंचन प्रकाश
मानव की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में चित्रांकन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रागैतिहासिक शैलाश्रय चित्र इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि मनुष्य ने अपनी अनुभूतियों, शिकार-जीवन और प्रतीकों को दृश्य रूप में अंकित किया। भाषा, संकेत और मौखिक परंपराओं के समानांतर विकसित होते हुए भी चित्रकला ने सामाजिक-सांस्कृतिक स्मृति के निर्माण में विशिष्ट योगदान दिया। यही परंपरा गुफा-चित्रों से आगे बढ़ते हुए विभिन्न सभ्यताओं में विकसित हुई और आज भी लोकजीवन में जीवित है। भारत के अनेक अंचलों की लोक चित्रकलाएं समकालीन कला परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति बनाए हुए हैं। आधुनिकता के विस्तार के बावजूद लोकचित्रों की प्रतीकात्मकता और सामुदायिक ऊर्जा आज भी आकर्षण का केंद्र है।
इसी सांस्कृतिक विरासत को रेखांकित करती प्रदर्शनी ‘बज्जिका आर्ट: कंचन प्रकाश और संजू देवी के बीच एक संवाद’ का उद्घाटन 11 फरवरी 2026 को दिल्ली स्थित चंपा ट्री आर्ट गैलरी में हुआ। यह पहल आईसीसीआर, म्यूजियम ऑफ सेक्रेड आर्ट (MOSA) और गैलरी के संयुक्त सहयोग से आयोजित की गई। चित्रकार कंचन प्रकाश और सुजनी कढ़ाई कलाकार संजू कुमारी को साथ प्रस्तुत करते हुए यह प्रदर्शनी रंग और धागे के बीच संवाद रचती है। कथात्मक कढ़ाई और समानांतर चित्रित रूपों के माध्यम से यह आयोजन स्त्री सृजनशीलता और बज्जिका अंचल की जीवित परंपराओं को सामने लाता है।
बज्जिकांचल की जिस बसेरी (या बंसेरी/देव-सिंगार) लोककला को यहां प्रमुखता दी गई, वह मिथिला या मंजूषा की तरह व्यापक पहचान नहीं पा सकी है। बज्जिका के विद्वान उदय नारायण सिंह के अनुसार बसेरी कला कभी इस अंचल की सांस्कृतिक पहचान थी, जो आधुनिकता की चकाचौंध में धूमिल पड़ रही है। फिर भी कुछ कला अनुरागी इसे जीवित रखे हुए हैं। इस परंपरा को संजोने में चुल्हिया देवी, वासमती देवी, इंदिरा देवी और कृति देवी जैसी महिला कलाकारों का उल्लेखनीय योगदान रहा है।
बसेरी कला मूलतः विवाह-परंपराओं से जुड़ी भित्ति-चित्रकला है। बज्जिकांचल, जिसमें बिहार के मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर और वैशाली जिले शामिल हैं, में यह विश्वास है कि विवाह के समय बांस-पूजन से वंश-वृद्धि और समृद्धि होती है। विवाह से पूर्व ‘मटकोर’ नामक रस्म के अवसर पर घर की बाहरी दीवारों को गोबर-मिट्टी से लीपकर उन पर बांस, पशु-पक्षी, फूल-पत्तियों और मंगल प्रतीकों का अंकन किया जाता है। कुछ स्थानों पर इस कार्य में नाई जाति की स्त्रियों की भी सहभागिता होती है।
मटकोर बिहार के ग्रामीण हिंदू विवाह संस्कारों की एक प्राचीन रस्म है। विवाह से एक-दो दिन पूर्व महिलाएं तालाब या खेत से मंगलगीत गाते हुए शुद्ध मिट्टी लाती हैं, जिससे मंडप (मड़वा) की वेदी तैयार की जाती है। यह मिट्टी धरती माता के आशीर्वाद, उर्वरता और नवजीवन का प्रतीक मानी जाती है। इसी क्रम में बांस के झुरमुट पर जाकर उसकी पूजा की जाती है। रोली, हल्दी, अक्षत और दीप अर्पित कर बांस देवता से अनुमति ली जाती है, तभी चयनित बांस काटा जाता है। बांस स्थायित्व, लचक और वंश वृद्धि का प्रतीक है।
बसेरी चित्र इन्हीं सांस्कृतिक मान्यताओं से प्रेरित होते हैं। दीवारों पर लंबवत बांस-आकृतियां, पत्तियां, चिड़ियां, लताएं और कभी-कभी सूर्य या कलश जैसे प्रतीक अंकित किए जाते हैं। रंगों में गेरुआ, हरा, पीला और नीला प्रमुख होते हैं। रेखांकन सरल, सजावटी और प्रतीकात्मक होता है। यह स्त्रियों की सामूहिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है, जो विवाह को प्रकृति और समुदाय से जोड़ती है।
राज्य पुरस्कार और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सीनियर फेलोशिप से सम्मानित कंचन प्रकाश ने इस दीवार-कला को कागज और कैनवास पर रूपांतरित कर नई पहचान दी है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कला संकाय से शिक्षित कंचन आधुनिक और समकालीन कला-भाषा से परिचित होते हुए भी अपने अंचल की परंपरा को संरक्षित और संवर्धित करने में सक्रिय हैं। उनके प्रयासों से यह विलुप्तप्राय कला राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुंच रही है। वस्तुतः बसेरी कला केवल एक लोकचित्र परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति-सम्मान, स्त्री-सृजन और सामुदायिक एकता का जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज है। इसके संरक्षण और संवर्धन के प्रयास निरंतर जारी रहें, यही अपेक्षा है।-सुमन कुमार सिंह
