बाराबंकी : जंग थमी पर सिलेंडर संग्राम जारी, औंधे मुंह होम डिलीवरी
बाराबंकी, अमृत विचार। ईरान अमेरिका के बीच जंग फिलहाल थमी हुई है पर बाराबंकी वासियों का घरेलू गैस सिलेंडर के लिए युद्ध जारी है। एजेंसियों पर लाइन नहीं लग रही इसका मतलब यह नहीं कि सबको सिलेंडर मिल रहा, बल्कि भीषण गर्मी में झड़प, बहस के बीच लाइन लगकर जूझते उपभोक्ता अब थक चुके हैं। चार दिन में सिलेंडर की होम डिलीवरी के दावे औंधे मुंह गिरे पड़े हैं, दो सप्ताह से भी अधिक समय लग रहा। मनमानी का आलम यह कि अब तक एजेंसियों का बैकलाग ही खत्म नहीं हो सका है। जिसकी वजह से उपभोक्ताओं का दर्द लाइलाज बना हुआ है।
ईरान अमेरिका युद्ध के साथ ही घरेलू गैस सिलेंडर का संकट शुरु हुआ था, दो देशों का युद्ध तो थम गया लेकिन सिलेंडर की जंग अभी भी जारी है। जिला स्तर पर कई बैठकें हुईं, दिशा निर्देश जारी हुए। नवागत डीएम ने भी इसे गंभीर समस्या मानकर सख्ती की पर नतीजा ढाक के तीन पात ही है। नियम कायदे तो बने पर इनके अनुपालन में जमकर कोताही बरती गई, आलम यह रहा कि उपभोक्ता को 25 दिन तो क्या 45 दिन बाद भी सिलेंडर नसीब नहीं हुआ।
इस संकट ने घर को तनाव, बहस विवाद का अड्डा बना डाला। आंकड़ों पर गैस सिलेंडर भी मिला और संकट भी दूर हुआ पर हकीकत में आम उपभोक्ता सिलेंडर के लिए जूझता रहा, सोर्स सिफारिश लगाता रहा। बीते कुछ दिनों से एजेंसियों पर भीड़ थमी है तो इसकी वजह भीषण गर्मी है न कि उनकी समस्या का समाधान। समस्या जस की तस बनी हुई है।
घरेलू की बात कौन करे, पांच किलो व व्यवसायिक सिलेंडरों को लोग भूल चुके हैं क्योंकि दावों के विपरीत इनकी उपलब्धता तय नहीं हो सकी है। जिसका सीधा असर व्यापार, काराेबार, छोटे दुकानदारों पर पड़ा है और खर्च बढ़ने के साथ ही कमाई घटी है। अधिकारी चाहे जो दावे करें पर गैस सिलेंडर का संकट कायम है और लोगों में चर्चा है कि पीएनजी कनेक्शन बढ़ाने के लिए घरेलू गैस का संकट उपजाया गया है।
रिश्तों में दरार डाल गया सिलेंडर संकट
घुंघटेर के ग्राम बौधनी में सिलेंडर न मिलने पर चूल्हे पर खाना बनाने से इंकार कर विवाहिता ससुराल छोड़ गई। मसौली में सिलेंडर न मिलने पर चूल्हे पर खाना बना रही विवाहिता झुलस गई। लोनीकटरा के ग्राम खैराबीरू में जयमाल से पहले दूल्हे ने दुल्हन से पूंछा कि सिलेंडर न मिला ताे चूल्हे पर खाना बना लोगी, दुल्हन के हां कहने पर शादी आगे बढ़ी।
शहर की निवासी उपभोक्ता मंशा देवी को बुकिंग के 12 दिन बाद गैस नसीब हुई, वह भी तगड़ी सिफारिश के बाद। मां को ब्रेन हेमरेज व पिता को कैंसर होने के चलते बेटे को आठ किमी पैदल जाकर सिलेंडर लेना पड़ा। घरेलू गैस को लेकर शिकायतों का ग्राफ इस कदर बढ़ा कि इनकी संख्या 650 हो गई, निस्तारण भगवान भरोसे। बहस, झड़प, वाद विवाद, मारपीट के बीच उपभोक्ता गैस के लिए जूझता रहा।
एमडीएम संकट, गुरुजी ढो रहे सिलेंडर
बेसिक शिक्षा विभाग में एमडीएम यानी मध्यान भोजन योजना पटरी से उतरी चुकी है। समय से सिलेंडर की उपलब्धता न हो पाने की वजह से दोपहर का भोजन हासिए पर चला गया है। स्कूलों का हाल यह कि गैस सिलेंडर के जुगाड़ में व्यस्त गुरुजी ही सिलेंडर ढाेने को मजबूर हैं। यह उनकी मजबूरी भी है क्योंकि येन केन प्रकारेण दोपहर का एमडीएम तो बनना ही है।
इसके लिए सिलेंडर न मिलने की दशा में दूसरे उपायों पर अमल किया जा रहा है। हालांकि जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी नवीन पाठक कहते हैं कि स्कूलों में भोजन बन रहा है और सिलेंडर की कोई किल्लत नही है। इतना जरूर है कि आपूर्ति के लिए मांग रखने के साथ ही कहना भी पड़ रहा है।
जिला पूर्ति अधिकारी राकेश तिवारी का कहना है कि गैस सिलेंडर की उपलब्धता बराबर बनी हुई है। होम डिलीवरी व्यवस्थित करने के लिए प्रयास जारी हैं। बैकलाग पर भी नजर रखी जा रही है।
