Pilibhit : मोती की खेती से आत्मनिर्भरता की इबारत लिख रहे तराई के किसान
पहले चरण में 526 गज के तालाब में सरैंदा पट्टी के वीरपाल से हुई शुरुआत
सौरभ सिंह पीलीभीत, अमृत विचार। इरादे मजबूत हों, तो सीमित जमीन भी सोना उगल सकती है। इन पक्तियों को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन योजना के तहत मिले प्रशिक्षण और प्रशासन के सहयोग के बाद तराई के किसानों ने साबित कर दिखाया है। छोटे से गांव, सीमित संसाधन और पारंपरिक खेती की बंदिशों से निकलकर वीरपाल से जिले में मोती की खेती की शुरुआत हुई। जिसके बाद दूसरे चरण में न्यूरिया हुसैनपुर के छह अन्य किसान भी मोती की खेती को अपना चुके हैं। मोती की खेती अब आय का मजबूत जरिया बनने जा रही है।
अमरिया ब्लॉक के गांव मिलक सरैंदा पट्टी निवासी वीरपाल जिले में मोती की खेती करने वाले पहले किसान हैं। वह सीमित संसाधनों के बावजूद नई तकनीक अपनाकर न केवल अपनी आय का रास्ता बदल रहे हैं, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं। करीब 15 वर्षों से पारंपरिक खेती कर रहे वीरपाल को पिछले वर्ष कृषि विभाग की एक संगोष्ठी ने नई दिशा दी। इस दौरान बाहर से आई कंपनी मणि एग्रो हब लखनऊ के विशेषज्ञों ने उन्हें मोती की खेती की बारीकियां समझाईं। यहीं से इस नई खेती की शुरुआत कर दी। वीरपाल ने एमए तक पढ़ाई की है। उन्होंने अपने तालाब में करीब 10 हजार सीप डाले हैं, जिनकी वह बच्चों की तरह देखभाल कर रहे हैं। एक सीप से दो मोती निकलेंगे। कंपनी द्वारा सीप की कीमत 62 रुपये तय की गई है, जबकि तैयार मोती को करीब 200 रुपये या उससे अधिक मूल्य पर वापस खरीदा जाएगा। बाजार में इन मोतियों की कीमत गुणवत्ता के अनुसार हजारों रुपये तक पहुंचती है। वीरपाल ने बताया कि 20 मीटर चौड़े और 22 मीटर लंबे तालाब में यह पूरी प्रक्रिया की जा रही है, जिसमें पानी का तापमान और गहराई बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। मोती तैयार होने में 12 से 18 माह का समय लगता है। इस दौरान नियमित देखभाल ही सफलता की कुंजी होती है। वीरपाल का मानना है कि एक बार मेहनत के बाद यह खेती किसानों के लिए स्थायी आय का मजबूत साधन बन सकती है। उन्होंने बताया कि 10 हजार सीप के लिए उनका खर्च 6.20 लाख और कुल मिलाकर साढ़े छह लाख खर्च आया। यही मोती तैयार होने के बाद 13.80 लाख का मुनाफा देंगे।
दूसरे चरण में न्यूरिया हुसैनपुर के छह किसान जुड़े
बता दें कि प्रथम चरण में ग्राम सरैंदा पट्टी में वीरपाल के तालाब में मोती की खेती शुरू हुई थी। इसके बाद राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन योजना के तहत कराई जा रही मोती की खेती के द्वितीय चरण में न्यूरिया हुसैनपुर के छह किसान परमिला मिस्त्री, चमेली वाछड़, नीलिमा अग्रवाल, कश्मीर कौर, कॉन्डेड जूलियन, मसूद हसन खान को खेती शुरू कराई गई। पूरे प्रोजेक्ट को लगाने एवं निर्देशित करने का कार्य निर्देशक मणि एग्रो हब लखनऊ ने किया था।
इस तरह तैयार होता है तालाब में मोती
मोती की खेती देखने में जितनी आकर्षक लगती है, उसकी प्रक्रिया उतनी ही वैज्ञानिक और सावधानीपूर्ण होती है। इसकी शुरुआत उपयुक्त स्थान और स्वच्छ पानी वाले तालाब के चयन से होती है, जिसकी गहराई सामान्यत 6 से 8 फिट और पानी का पीएच स्तर 7 से 8.5 के बीच रखा जाता है। इसके बाद 5 से 6 इंच लंबी स्वस्थ सीपियों का चयन कर उन्हें 1-2 दिन तक सादे पानी में रखकर ऑपरेशन के लिए तैयार किया जाता है। सबसे अहम चरण ग्राफ्टिंग का होता है, जिसमें सीप के भीतर हल्का चीरा लगाकर उसमें 2-4 मिमी का न्यूक्लियस (बीड) और एक अन्य सीप का टिश्यू डाला जाता है। सर्जरी के बाद सीपों को 10 से 15 घंटे तक विशेष देखभाल में रखा जाता है, ताकि वे सामान्य स्थिति में आ सकें। इसके बाद इन्हें जालों में रखकर तालाब में निश्चित गहराई पर लटका दिया जाता है। पूरे पालन के दौरान सीपों की नियमित सफाई, तालाब में प्राकृतिक भोजन (प्लवक) की उपलब्धता और मृत सीपों को हटाना जरूरी होता है। करीब 15 से 18 महीने बाद सीप को खोलकर मोती निकाला जाता है। सही देखभाल और तकनीक के साथ इस प्रक्रिया में 80 से 90 प्रतिशत तक सफलता हासिल की जा सकती है, जो इसे किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बनाती है।
