मध्य प्रदेश सरकार का नारी सशक्तिकरण का संकल्प

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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प्रमोद भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार

 

महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने की दिशा में मध्य प्रदेश सरकार ने पहल की है। विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर नारी शक्ति वंदन का संकल्प लिया है। इस संकल्प लेने का उद्देश्य है कि विधेयक को कानूनी रूप देते समय जो चूक हुई थी, उसे संशोधित कर दिया जाए।

महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार ने पहल की है। विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर नारी शक्ति वंदन का संकल्प लिया है। इस संकल्प लेने का उद्देश्य है कि विधेयक को कानूनी रूप देते समय जो चूक हो गई थी, उसे संशोधित कर दिया जाए। इसमें प्रावधान है कि 2021 की जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह कानून लागू होगा, किंतु कोरोना के चलते 2021 की जनगणना टालनी पड़ी। अब जनगणना के पहले चरण की शुरुआत हुई है, जिसके अंतिम परिणाम 2028 तक आएंगे, इसलिए केंद्र सरकार विधेयक के पारित हो चुके प्रारूप में संशोधन के लिए प्रस्ताव लाई थी, जो संसद में पारित नहीं हो सका। 2023 में पारित हुए इस विधेयक में संशोधन किए बिना 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव में इसे लागू नहीं किया जा सकता है। परिसीमन से तात्पर्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निधारण से है।  

देश की महिलाओं को निर्वाचन में भागीदारी का उचित लाभ दिलाने की दृष्टि से मध्य प्रदेश सरकार ने विधानसभा में नारी शक्ति वंदन संकल्प पर आठ घंटे चर्चा की और उसे ध्वनि मत से पारित भी कर दिया। इस विधेयक के अनुसार सभी राज्यों में एक समान रूप से 50 प्रतिशत सीटों की बढ़ोतरी की जानी है, परंतु विपक्ष की यह आशंका बनी रही कि परिसीमन के बहाने सीटों की संरचना कुछ इस तरह से निर्धारित होगी कि भाजपा समर्थित वोट बड़ी संख्या में क्षेत्र विशेष में समा जाएं।

विधेयक पास होने पर मध्य प्रदेश विधानसभा की सदस्य संख्या 230 से बढ़कर 345 हो जातीं। इनमें से 114 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित हो जातीं। इस समय देश में करीब 44 करोड़ महिला मतदाता हैं। इन्हीं में से 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाएं उम्मीदवार बनाई जातीं। 2034 में क्या स्थिति बनेगी, यह भविष्य के गर्भ में है।

जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है, तो दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों के दल प्रमुखों ने यह अंदाजा लगा लिया कि इन प्रांतों में जनसंख्या कम होने के कारण राजनीतिक रूप से वे नुकसान में रहेंगे। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने इस पहल को संघीय ढांचे को कमजोर करने और दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक आवाज को दबाने वाला कदम बता दिया था और तेलंगाना के उप मुख्यमंत्री शिवकुमार ने कहा था कि इतना बड़ा संवैधानिक बदलाव सभी दलों की सहमति के बिना संभव नहीं है। इन साझा आवाजों की बुलंदी ने इन विधेयकों को पारित नहीं होने दिया। 

विपक्ष ने कोटे में कोटा देने का उपाय की भी मांग कर डाली थी। इसी को लेकर मोहन यादव ने तार्किक उत्तर देते हुए विधानसभा में कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण की मांग सर्वथा अनुचित है। मायावती ने इस विधेयक का स्वागत करते हुए कहा कि 33 प्रतिशत कोटे में एससी-एसटी और ओबीसी की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था हो।  (यह लेखक के निजी विचार हैं)