राजस्थान बनाम लोकसभा : शक्ति की ओर बढ़ती आधी आबादी

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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डॉ. कैलाश चंद सैनी
पूर्व मुख्य अंवेषण एवं संदर्भ अधिकारी

 

लोकतंत्र की सार्थकता केवल मतदान की ऊंची दरों में नहीं, बल्कि विधायी सदनों के भीतर प्रतिनिधित्व की वास्तविक समावेशिता में निहित है। प्रश्न यह है कि क्या बढ़ती चुनावी भागीदारी सत्ता-संरचना में समान हिस्सेदारी में भी रूपांतरित हो रही है? राजस्थान के सात दशकों का विधायी अनुभव इस प्रश्न का एक ऐसा सांख्यिकीय उत्तर प्रस्तुत करता है, जो स्थापित राष्ट्रीय धारणाओं को चुनौती देते हुए संख्या से शक्ति की ओर बढ़ती आधी आबादी के एक नए और सशक्त यथार्थ को उजागर करता है।

लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था की जीवंतता केवल चुनावों की नियमितता या मतदाता भागीदारी की ऊंची दर से नहीं आंकी जा सकती; उसकी वास्तविक कसौटी इस बात में निहित होती है कि वह अपने नागरिकों को किस हद तक समावेशी, संतुलित और प्रभावी प्रतिनिधित्व प्रदान करती है। हाल के लोकसभा चुनावों के प्रथम चरण में पश्चिम बंगाल में दर्ज 92.72 प्रतिशत मतदान यह संकेत अवश्य देता है कि भारतीय मतदाता लोकतंत्र के प्रति अत्यंत सजग है, किंतु इसके समानांतर एक मूलभूत प्रश्न अब भी प्रासंगिक बना हुआ है कि क्या यह व्यापक भागीदारी सत्ता-संरचना में समान प्रतिनिधित्व में भी रूपांतरित हो रही है?

महिला प्रतिनिधित्व इसी प्रश्न की सबसे सटीक कसौटी है। जब हम लोकसभा तथा राजस्थान विधानसभा के आंकड़ों को साथ रखकर देखते हैं, तो एक ऐसा परिदृश्य उभरता है, जो स्थापित धारणाओं को चुनौती देता है। सामान्य धारणा यह रही है कि राष्ट्रीय राजनीति प्रतिनिधित्व के प्रश्नों पर अपेक्षाकृत अधिक प्रगतिशील होती है, जबकि क्षेत्रीय राजनीति परंपरागत सामाजिक संरचनाओं से अधिक प्रभावित रहती है, किंतु महिला प्रतिनिधित्व के संदर्भ में राजस्थान का अनुभव इस धारणा को उलट देता है।

1952 से 2023 तक की 16 विधानसभाओं में कुल 2080 सीटों पर हुए चुनावों में 330 बार महिलाओं ने विजय प्राप्त की है, जो औसतन 11 प्रतिशत से अधिक है। इसके विपरीत, 18 लोकसभाओं के लिए हुए कुल 9573 निर्वाचनों में केवल 745 महिलाएं ही निर्वाचित हो सकी हैं, जो लगभग 7.78 प्रतिशत है। यह 3.22 प्रतिशत का अंतर मात्र सांख्यिकीय नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक संकेत का द्योतक है कि राजस्थान के मतदाताओं ने राष्ट्रीय औसत की तुलना में महिला नेतृत्व पर अधिक भरोसा जताया है, जहां राष्ट्रीय स्तर पर वृद्धि धीमी किंतु अपेक्षाकृत स्थिर रही है, वहीं राजस्थान में अवसर अधिक दिखाई देते हैं, पर उनकी निरंतरता उतनी सुनिश्चित नहीं है।

लोकसभा में राजस्थान की महिलाओं की उपस्थिति का इतिहास स्वयं में एक उतार-चढ़ावपूर्ण यात्रा का द्योतक है। यह उल्लेखनीय है कि पहली, दूसरी और छठी लोकसभा में राजस्थान से एक भी महिला सांसद निर्वाचित नहीं हुई। 1952 से 2024 तक राजस्थान से कुल 22 महिलाओं ने लोकसभा में प्रवेश किया, जिन्होंने कुल मिलाकर 34 बार विजय प्राप्त की। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि जहां प्रवेश के अवसर धीरे-धीरे बढ़े हैं, वहीं उनकी निरंतरता सीमित रही है।

इन 22 महिलाओं में से केवल छह ऐसी नेत्रियां रही हैं, जिन्होंने एकाधिक बार लोकसभा में स्थान बनाया। श्रीमती वसुंधरा राजे का पांच बार निर्वाचित होना, डॉ. गिरिजा व्यास का चार बार तथा राजमाता गायत्री देवी का तीन बार संसद पहुंचना इस प्रवृत्ति के उदाहरण अपवादस्वरूप हैं। इसके विपरीत, 16 महिलाएं ऐसी रही हैं जो केवल एक बार ही लोकसभा तक पहुंच सकीं। यह स्थिति एक स्पष्ट संदेश देती है कि राजनीति में महिलाओं के लिए प्रवेश अब संभव है, पर स्थायित्व अभी भी चुनौतीपूर्ण है।

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