ज्येष्ठ माह और जलदान की सनातन परंपरा
‘जल ही जीवन है’ ज्येष्ठ माह की गर्मी की प्रचंडता इस कहावत को सौ फीसदी सच साबित करती है। सूर्य किरणों की तपन की ज्येष्ठता (प्रचंडता) के कारण हिन्दू पंचांग में वर्ष के तीसरे महीने को ज्येष्ठ कहा जाता है। सर्वाधिक बड़े दिन वाला यह महीना गर्मी के हिसाब से सबसे ज्यादा कष्टकारी होता है। इस महीने में ‘नौतपा’ नक्षत्र भी लगता है। ‘नौतपा’ यानी सर्वाधिक तपने वाले नौ दिन। ज्योतिषीय गणना के अनुसार माना जाता है कि जेठ महीने में सूर्य जब रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब गर्मी प्रचंड पड़ती है। इन दिनों में वायुमंडल का अधिकतम तापमान 45 से 48 डिग्री तक पहुंच जाता है। आधुनिक मौसम वैज्ञानिक इसे ‘हीट वेव’ या लू वाले दिन भी कहते हैं।
लोककवि घाघ व भड्डरी का सटीक मौसम विज्ञान
ज्ञात हो कि हमारे भारत की पुरातन कृषि संस्कृति के सदियों पुराने अनुभवों से निकले निष्कर्ष आज के मशीनी युग में भी कितने सही साबित हो रहे हैं, यह विचारणीय बिंदु है। भारतीय लोकजीवन के मौसम विज्ञानी माने जाने वाले महाकवि घाघ और भड्डरी द्वारा मध्ययुग में मौसम, वर्षा और कृषि को लेकर की गईं भविष्यवाणियां आज की इक्कीसवीं सदी में भी उतनी ही सटीक हैं, जो तब थीं जब पर्यावरण संकट और ऋ तु चक्र परिवर्तन जैसी कोई परिकल्पना भी नहीं थी।
जानना दिलचस्प हो कि कहावतों व लोकोक्तियों में की गई इन भविष्यवाणियों में ‘नौतपा’ के बारे में लोककवि घाघ कहते हैं- जेठ मास जो तपे निरासा, तब जानों बरसा की आसा। तपै नवतपा नव दिन जोय, तौ पुन बरखा पूरन होय।। अर्थात यदि ज्येष्ठ माह में नौतपा खूब तपा तो उस साल बारिश जमकर होगी। वहीं यदि नौतपा के दौरान बारिश हो गई तो इसे ‘नौतपा’ का गलना कहा जाता है। ऐसा होने पर मानसून के दौरान अच्छी बारिश की संभावना नहीं होती। इसी तरह महाकवि घाघ के समकालीन लोककवि भड्डरी भी कहते हैं- सर्व तपे जो रोहिनी, सर्व तपे जो मूर। परिवा तपे जो जेठ की उपजे सातों तूर।। अर्थात जब जेठ के रोहिणी नक्षत्र की परेवा में गर्मी खूब गर्मी पड़ती है, तो उस वर्ष जमकर वर्षा होती है। वाकई हैरानी की बात है कि इन बातों का कोई वैज्ञानिक आधार न होते हुए भी यदि हम देश के मानसून के बारे में सोचें तो यह अनुमान सही प्रतीत होते हैं।
ज्येष्ठ माह के भंडारों की पावन परंपरा
ज्येष्ठ माह में सूर्य के प्रचंड ताप के कारण कुएं, नदी, तालाब व पोखर आदि जलस्रोतों के सूख जाने के कारण जल संकट की समस्या गहरा जाती है। हम मनुष्य तो किसी तरह अपने आप को इस भीषण गर्मी से सुरक्षित रख लेते हैं, लेकिन उन निरीह पशु-पक्षियों का क्या जिनके लिए यह आग उगलती गर्मी किसी जानलेवा मुसीबत से कम नहीं होती। भूख और प्यास की वजह से पशु-पक्षियों के दम तोड़ने की सर्वाधिक घटनाएं इसी चिलचिलाती गर्मी के मौसम में होती हैं। इन मूक पशु-पक्षियों का यूं भूखा-प्यासा रहकर दम तोड़ना हमारे प्रकृति चक्र और पर्यावरण के लिए बेहद अशुभ है। आज वैज्ञानिक भी मानते हैं कि भोजन शृंखला के चलते एक जीव का जीवन दूसरे पर और वनस्पती व जीवों का जीवन परस्पर अस्तित्व पर टिका है।
अप्राकृतिक रूप से कोई एक जीव मरता है, तो उससे पूरी शृंखला प्रभावित होती है। ज्ञात हो कि हमारे वैदिक मनीषी मानवी चेतना के मर्मज्ञ होने के साथ प्रकृति संरक्षण के ज्ञान विज्ञान के भी गहन जानकार थे। इसीलिए उन्होंने सदियों पूर्व ही कुदरत के ऋ तु चक्र परिवर्तन के अनुरूप समाज में ऐसी परंपराएं विकसित कर दी थीं ताकि धार्मिक क्रियाकलापों के अनुपालन के साथ जन सामान्य विषम व प्रतिकूल परिस्तिथियों में कुदरत के ताने-बाने को क्षरित होने से बच सके।
‘ज्येष्ठ’ माह में जल संरक्षण के साथ अन्न व जलदान हमारे की महान पूर्वजों द्वारा विकसित ऐसी ही एक श्रेष्ठ परंपरा है, जिसका अनुपालन आज भी हमारी ग्राम्य संस्कृति में देखा जा सकता है। यह हमारी वैदिक महान संस्कृति की अत्यंत प्राचीन परंपरा है। इस परंपरा के तहत वैशाख व जयेष्ठ मास में जब गांव में फसल का नवीन अन्न आता है, तो पूरे माह भर स्थान पर देव पूजा के साथ भंडारे आयोजित किए जाते हैं। इन भंडारों से अनेक लाभ होते हैं। पहला तो समष्टि के प्रति लोकमंगल की भावना विकसित होती है। दूसरे इन आयोजनों में अमीर-गरीब सभी के लिए बिना किसी भेदभाव के प्रसाद पाने की व्यवस्था होने से सामाजिक समरसता बढ़ती है तथा तीसरे इनसे बन्दर, कुत्ते, कौए, चिड़िया व चीटीं आदि अनेक मनुष्येत्तर जीवों को भी इस तपती शुष्क ऋ तु में सहजता से पेट भरने लायक आहार उपलब्ध हो जाता है।
- पूनम नेगी
