क्राउड से किरदार तक : एक अभिनेता की बेबाक कहानी
मुंबई चमक-दमक, सपनों और संघर्षों की नगरी है, यहीं पर जन्में जाकिर हुसैन खान, जिनकी जड़ें पूर्वांचल के छोटे से जिले बस्ती से जुड़ी हैं। इनकी शुरुआती शिक्षा भी यहीं से हुई। बचपन बस्ती की सादगी, रामलीला और नुक्कड़ नाटकों के बीच बीता, जहां उन्होंने बंदर बनकर पहली बार मंच का स्वाद चखा, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, मायानगरी मुंबई की चकाचौंध ने उन्हें अपनी ओर खींचा और भीड़ भरी सड़कों पर काम की तलाश, छोट-छोटे रोल पाने के लिए लगातार संघर्ष करतें रहे। क्राउड एक्टिंग से सफर शुरू कर धीरे-धीरे टीवी और फिल्मों में अपनी जगह बनाई। जाकिर आज भी खुद को जमीन से जुड़ा कलाकार मानते हैं। मुंबई की इसी चकाचौंध और उसके पीछे छिपे कड़वे सच को उन्होंने बेबाकी से उजागर किया।
-क्या इंडस्ट्री में आने के लिए संघर्ष करना पड़ा?
बिल्कुल, मैं सुबह काम की तलाश में घर से निकलता और शाम को निराश होकर घर लौट आता। धीरे-धीरे मुझे क्राउड एक्टिंग में काम मिलने लगा। हंसते हुए, कहीं आग लग गई तो चिल्लाने को कहा जाता,‘टीपू सुल्तान’ में मुझे ‘जय हनुमान’ बोलने को कहा गया। फिर मुझे 1992 में आमिर खान के साथ फिल्म ‘जो जीता वही सिकंदर’ में काम मिला। उस समय मुझे एक दिन के 50 रुपए और 15 दिन के 750 रुपये मिले थे। आज साढ़े सात करोड़ रुपये मिल जाएं तो भी वो खुशी नहीं मिलेगी, जो उस साढ़े सात सौ रुपए में मिली थी।
-किन-किन कलाकारों के साथ आपने काम किया?
मैंने हेमा मालिनी, अनिल कपूर, संजय दत्त, अमिताभ बच्चन के साथ पोलियो ऐड के लिए काम किया। इसके अलावा सलमान खान, इरफान खान, जूही चावला, सोनू सूद, कादर खान और परेश रावल जैसे कई कलाकारों के साथ काम किया। टेलीविजन में सीआईडी, पवित्र रिश्ता, चाचा चौधरी,सावधान इंडिया के कई एपिसोड में भी मैंने एक्टिंग की।
-आपको असली पहचान कब मिली?
1998 में जब सीआईडी सीरियल शुरू हुआ, जिसमें मुझे विलेन का रोल मिला। वहीं से पहचान मिलने शुरू हो गए। मैंने करीब 4000 टीवी एपिसोड और 72 से 75 फिल्मों में काम किया हैं।
-अभिनेता बनना मुश्किल हैं, पर नेता बनना आसान हैं, आपने ऐसा क्यों कहा?
व्यंग्यात्मक अंदाज में, देखिए, अभिनेता बनने के लिए खूबसूरती, टैलेंट और व्यक्तित्व चाहिए, लेकिन आज के दौर में नेता बनने के लिए सिर्फ बोलने की कला काफी है। हंसते हुए, एक आईएएस की सैलरी दो या ढाई लाख रुपए महीना होती है, जबकि एक सुपरस्टार एक फिल्म के करोड़ों रुपये लेते हैं। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि अभिनेता बनना कितना मुश्किल है।
-क्या इंडस्ट्री में नेपोटिज्म हैं? क्या पैसा और बैकग्राउंड भी ज़रुरी हैं?
आज के समय में टैलेंट के साथ-साथ पैसा भी जरूरी हो गया है। अगर मैं किसी अरबपति बाप का बेटा होता, तो शायद सुपरस्टार बन गया होता। जहां तक नेपोटिज्म की बात है, तो नेपोटिज्म हर जगह है, राजनीति में भी हैं।
-कास्टिंग काउच पर आपकी क्या राय है?
मुझे नहीं लगता कि इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच जैसी कोई चीज भी है। कुछ लोग आगे बढ़ने के लिए खुद समझौता करते हैं।
-क्या आपको सुपरस्टार न बनने का अफसोस हैं?
बिल्कुल नहीं, आज मैं ज्यादा सुकून में हूं। स्टार्स के पास सबकुछ होता है, लेकिन प्रेशर भी बहुत होता है। मेरा मानना है ‘जो प्राप्त है, वहीं पर्याप्त’ है।
-सुशांत सिंह राजपूत के बारे में आपकी क्या राय है ? शायद वह आपके दोस्त थे?
जी, सुशांत मुझसे उम्र में काफी छोटे थे पर, मेरी मित्रता थी। उन्होंने बहुत सफलता पाई, लेकिन मैंने उन्हें फ्रस्ट्रेशन में देखा। इसलिए कहते हैं कि शोहरत हमेशा खुशी नहीं देती।
-आपकी एकता कपूर के साथ क्या विवाद था?
2014 में एकता कपूर की एक सीरियल के शूटिंग के दौरान कलाकारों के बीच विवाद हो गया और मैं बीच-बचाव करने चला गया, जिससे बात बढ़ गई और मामला एकता कपूर और महेश भट्ट तक पहुंच गया। बाद में समझौता हो गया, लेकिन मुझे सिरियल छोड़ना पड़ा।
-कोई यादगार पल?
एक बार प्रयागराज कुंभ मेले 2019 में परफार्मेंस करने के लिए मेरे पास फोन आया, मुझे लगा कोई मजाक कर रहा है, क्योंकि मैं मुस्लिम हूं, लेकिन एक घंटे के अंदर मेरे एकाउंट में जब 50 हजार रुपये एडवांस आ गए तब मुझे विश्वास हुआ और 15 मिनट परफार्मेंस करने के लिए मुझे डेढ़ लाख रुपये मिले थे। आज तक मैं इस बात को भूला नहीं।
-आपके लिए सबसे गर्व का पल?
जब 2019 में इंडियन सिनेमा का सबसे बड़ा अवार्ड ‘दादा साहेब फाल्के फिल्म फाउंडेशन अवार्ड’ मुझे मिला, वो मेरे लिए सबसे गर्व का पल था। इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार ने एक कलाकार के रूप में मुझे सस्ते दाम पर फ्लैट भी उपलब्ध कराया।
-आपकी आने वाली फिल्म?
जी, ‘दुनिया तेरे नाम’ एक लव स्टोरी पर आधारित फिल्म है, जिसमें मैं मुख्य विलेन की भूमिका निभा रहा हूं और इस साल के अंत तक फिल्म रिलीज करने की योजना है।
-स्टारडम बनने का ख्वाब देखने वाले युवक-युवतियों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
आज का दौर डिजिटल का है। अगर आपके भीतर हुनर है, तो बड़े मंच का इंतजार मत कीजिए, अपना खुद का मंच बनाइए। अगर आप साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं, आपका कोई मजबूत आधार नहीं है, तो स्टार बनने का सपना देखना बहुत कठिन डगर है। शोहरत एक नशा है, जो दिखने में आकर्षक है, लेकिन अक्सर इंसान को भटका भी देती है।
निशा सिंह
