पौराणिक कथा : गांधारी को 100 पुत्रों का वरदान 

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Published By Anjali Singh
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हस्तिनापुर समय के साथ आगे बढ़ रहा था। माता सत्यवती और पितामह भीष्म अब अतीत की स्मृतियों को पीछे छोड़ वर्तमान में स्थिर हो चुके थे। भीष्म ने अपनी महान प्रतिज्ञा के अनुसार स्वयं को पूरी तरह हस्तिनापुर और उसके सिंहासन की रक्षा में समर्पित कर दिया था, वहीं सत्यवती भी इस गौरवशाली कुरुवंश की मर्यादा और सुरक्षा में तल्लीन थीं। धृतराष्ट्र और पांडु दोनों का विवाह संपन्न हो चुका था और अब राजवंश में नई पीढ़ी के आगमन की आशा जाग उठी थी।

वैशंपायन ने वर्णन किया कि महाराज पांडु ने अपनी पत्नियों कुंती और माद्री के साथ कुछ समय सुखपूर्वक व्यतीत किया, किंतु शीघ्र ही उन्होंने राज्य की बागडोर भीष्म के संरक्षण में सौंपकर दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया। वे जिस दिशा में गए, वहां के अनेक राज्यों को अपने पराक्रम से जीत लिया। कहीं उन्होंने मैत्री संधियां स्थापित कीं, तो कहीं अन्यायी राजाओं को हटाकर न्यायपूर्ण शासन की स्थापना की। कई महीनों तक चले इस अभियान के बाद वे अपार धन-संपदा, स्वर्ण और रत्न लेकर हस्तिनापुर लौटे।

उनके लौटने पर नगर में उत्सव का वातावरण था। भीष्म ने उन्हें स्नेहपूर्वक आलिंगन किया, विदुर ने आशीर्वाद दिया और धृतराष्ट्र ने उनके पराक्रम की सराहना की। माताओं ने स्नेह बरसाया और कुंती-माद्री ने आरती उतारकर उनका स्वागत किया। पांडु द्वारा लाया गया धन राजकोष को समृद्ध कर गया। उन्होंने बड़ों को आभूषण भेंट किए और प्रजा में भी उदारता से दान वितरित किया।

इसके बाद पांडु अपनी पत्नियों के साथ वन की ओर चले गए, जहां वे सरल और शांत जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें शिकार का विशेष शौक था और जब वे धनुष-बाण तथा शस्त्रों से सुसज्जित होकर वन में निकलते, तो उनका तेज किसी देवता के समान प्रतीत होता। नगरवासी और वनवासी दोनों ही उनसे अत्यंत प्रेम और सम्मान करते थे। धृतराष्ट्र की अनुमति से उन्हें वन में सभी आवश्यक सुख-सुविधाएं भी भेजी जाती थीं।

इधर हस्तिनापुर में भी घटनाएं चलती रहीं। भीष्म ने एक सुशील कन्या से विदुर का विवाह कराया, जिनसे आगे चलकर बुद्धिमान संतानों का जन्म हुआ। उसी समय गांधारी भी गर्भवती हुईं। उनके विषय में कहा जाता है कि उन्हें शिव से सौ पुत्रों का वरदान प्राप्त था। एक दिन जब वे इस वरदान के विषय में चिंतन कर रही थीं, तभी महर्षि वेदव्यास महल में पधारे। थकान और कष्ट के बावजूद गांधारी ने उनकी अत्यंत श्रद्धा से सेवा की। प्रसन्न होकर व्यास ने उन्हें वर मांगने को कहा। तब गांधारी ने अपने पति के समान सौ पुत्रों की कामना व्यक्त की। व्यास के आशीर्वाद से उन्होंने गर्भ धारण किया और अपने सौ पुत्रों के जन्म की प्रतीक्षा करने लगीं।

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