खेल बचपन के तब पूरा मैदान एक सुर में चिल्लाता 'पिडडु'

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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कॉलोनी के नुक्कड़ पर पांच-छह बच्चे घेरा बनाए खड़े हैं। बीच में एक के ऊपर एक सलीके से टिके सात चपटे पत्थर रखे हैं। एक बच्चा हाथ में रबर की गेंद लिए निशाना साधता है। सांसें थमी हुई हैं... और तड़ाक! गेंद पत्थरों के बीचों-बीच लगती है। पत्थर बिखरते हैं और उसके साथ ही गूंजती है एक शोर ‘भागो-भागो, गेंद उठाओ’ कोई पत्थरों को वापस समेटने के लिए दौड़ रहा है, तो कोई पीठ पर गेंद की मार से बचने के लिए हवा से बातें कर रहा है। जैसे ही आखिरी पत्थर पिरामिड के ऊपर टिकता है, पूरा मैदान एक सुर में चिल्ला उठता है पिडडु। 

बचपन में यह खेल सभी ने खेला है। अलग-अलग जगहों पर इसके अलग-अलग नाम हैं, लेकिन खेल का तरीका तकरीबन सभी जगह एक जैसा ही है। पहाड़ में इसे ‘पिडडु’ (समपोलिया) कहते हैं। आज के महंगे गेमिंग कंसोल और गैजेट्स के दौर में पिडडु की सादगी हैरान करने वाली है। इसके लिए न तो किसी महंगे गियर की जरूरत है और न ही किसी विशेष कोर्ट की। 

सामग्री, बस सात चपटे पत्थर और एक रबर की गेंद। दो टीमें और जीतने का वो बेहिसाब जज्बा। यह खेल सिर्फ भागदौड़ का नहीं है, यह एक बेहतरीन रणनीतिक खेल है। जब खिलाड़ी पत्थरों को निशाना बनाता है, तो उसका फोकस (एकाग्रता) परखता है। जब फील्डर्स गेंद लपकते हैं, तो उनकी फुर्ती की परीक्षा होती है। जब पूरी टीम अपने साथी को गेंद की मार से बचाने के लिए ढाल बनती है, तब जन्म लेता है असली ‘टीम वर्क’। 

सड़कें भले ही अब कंक्रीट की हो गई हों और मैदानों पर बहुमंजिला इमारतें तन गई हों, लेकिन ‘पिडडु’ की आत्मा आज भी जिंदा है। यह खेल हमें सिखाता है कि चीजें कितनी भी बिखर जाएं (उन सात पत्थरों की तरह), अगर टीम साथ हो, तो उन्हें फिर से संजोया जा सकता है। फिर देर किस बात की इस वीकेंड अलमारी के किसी कोने से पुरानी टेनिस बॉल निकालिए, कुछ पत्थर तलाशिए और अपने बच्चों को लेकर मैदान में उतर जाइए। यकीन मानिए, पत्थरों के उस पिरामिड के साथ आपका खोया हुआ बचपन फिर से मुस्कुरा उठेगा।