‘अर्बन हीट आइलैंड’ का बढ़ता प्रभाव
लेख-योगेश कुमार गोयल, वरिष्ठ पत्रकार
‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे दिन और रातें अत्यधिक गर्म हो रही हैं। पिछले चार दशकों में हीट वेव (लू) से होने वाली मौतों में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बदलती जलवायु के कारण भारत सहित दुनिया के अनेक हिस्से भीषण हीट वेव की चपेट में है। अब यह संकट पारंपरिक क्षेत्रों से निकलकर तटीय इलाकों तक फैल चुका है। अंधाधुंध शहरीकरण, घटती हरियाली और कंक्रीट के बढ़ते निर्माण से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे दिन और रातें अत्यधिक गर्म हो रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर से लेकर दिल्ली की गलियों और विदर्भ के मैदानों तक पारा 45 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर चुका है। यह केवल बढ़ते तापमान का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक गहराता सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और आर्थिक चेतावनी है। हीट वेव अब केवल मौसमी असुविधा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और मानव अस्तित्व के लिए गंभीर संकट बन चुकी है। बढ़ते तापमान, घटती हरियाली और कंक्रीट के फैलते जंगलों ने जीवन को लू की लपटों में समेट दिया है।
मौसम विभाग और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के ताजा आंकड़ों ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। पिछले चार दशकों में हीट वेव (लू) से होने वाली मौतों में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। गौर करने वाली बात यह है कि हीट वेव अब केवल अपने पारंपरिक गढ़ (उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत) तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने दक्षिण भारत के उन तटीय इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जो ऐतिहासिक रूप से कम ताप प्रभावित रहते थे। अध्ययन बताते हैं कि 1981 से 2000 के बीच लू की औसत अवधि जहां 2.5 से 5.5 दिन थी, वहीं 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 8.5 दिन तक पहुंच गई। लू का भौगोलिक दायरा भी 11.9 लाख वर्ग किलोमीटर से फैलकर 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर हो चुका है।
यह विस्तार बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की कड़वी हकीकत है। हमारे शहर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके हैं, जो दिनभर गर्मी सोखते हैं और रात में उसे मुक्त करते हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव पैदा होता है। इस तपती आग में सबसे अधिक जोखिम उन लोगों (रेहड़ी-पटरी वाले, निर्माण श्रमिक और दिहाड़ी मजदूर) का है, जो खुले आसमान के नीचे अपना वजूद तलाशते हैं। इनके पास न तो कूलिंग सेंटर की सुविधा है और न ही काम के घंटों में लचीलापन। इसके साथ ही बच्चे और बुजुर्ग इस बढ़ते ‘डिस्कंफर्ट इंडेक्स’ के सबसे आसान शिकार बन रहे हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक तापमान में वृद्धि से आगामी वर्षों में हीट वेव, गर्मी का मौसम ज्यादा समय तक रहने और सर्दी के मौसम का समय घटने जैसी स्थितियां पैदा होंगी। इस बारे में वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि जिस जलवायु परिवर्तन के बारे में अब तक हम केवल पढ़ते-सुनते रहे थे, वह अब हमारे सामने आकर खड़ा हो गया है। भारत में मई का महीना गर्म हवाओं (लू) का चरम समय होता है और लू की घटनाओं को भी मौसम में दिन-प्रतिदिन बदलाव का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है, लेकिन चिंता की बात यही है कि लू की तीव्रता लगातार वर्ष दर वर्ष बढ़ रही है। पिछले करीब डेढ़ दशकों में 2009, 2010, 2016, 2017 और 2022 भारत में रिकॉर्ड किए गए पांच सबसे गर्म वर्ष रहे। आईएमडी के मुताबिक 15 सबसे गर्म वर्षों में से 11 वर्ष 2008 से 2022 के बीच ही दर्ज किए गए।
यह जानना भी जरूरी कि हीट वेव आखिर है क्या? जैसा कि नाम से ही जाहिर है, हीट वेव अत्यधिक गर्म मौसम की अवधि है, जो प्रायः दो या ज्यादा दिनों तक रहती है। जब तापमान किसी क्षेत्र के सामान्य औसत तापमान से अधिक हो जाता है, तो उसे ‘हीट वेव’ कहा जाता हं। आईएमडी के अनुसार मैदानी इलाकों का अधिकतम तापमान जब 40 डिग्री सेल्सियस तक और पहाड़ी क्षेत्रों का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो लू चलने लगती है और यदि तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो यह खतरनाक लू की श्रेणी में कही जाती है। इसी प्रकार तटीय क्षेत्रों में जब तापमान 37 डिग्री सेल्सियस हो जाता है, तो लू चलने लगती है।
हीट वेव के कारण लोगों के बीमार होने और हीट स्ट्रोक का खतरा बहुत बढ़ जाता है, तथा सैंकड़ों लोगों की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1998 से 2017 के बीच हीट वेव के कारण 1.66 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और यह आंकड़ा अब वर्ष दर वर्ष तेजी से बढ़ रहा है। आईआईटी खड़गपुर के एक अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि तापमान में वृद्धि तथा लू का मानव शरीर पर व्यापक असर पड़ रहा है। गर्म हवाओं से ब्रेन स्ट्रोक, हृदयाघात, नसों में खून के थक्के जमने की आशंका, स्थायी विकलांगता का खतरा बढ़ जाता है और इससे मृत्यु दर में भी वृद्धि हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हीट वेव बाढ़ के बाद दूसरी सबसे घातक आपदा है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौतियां पेश कर रही है। लू का असर हृदय तथा फेफड़े जैसे अंगों पर सर्वाधिक पड़ता है, जो बेहद खतरनाक हो सकता है। हीट वेव से ऐसे लोगों की स्थिति और खराब होने की संभावना होती है, जो हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गुर्दे की बीमारी इत्यादि समस्याओं से पीड़ित हैं। आईएमडी के मुताबिक वैसे तो हर साल दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना इत्यादि उत्तर पश्चिमी भारत, मध्य, पूर्व और उत्तर प्रायद्वीपीय भारत के मैदानी इलाकों में मार्च से जून के दौरान हीट वेव का दौर चलता है, लेकिन जैसे-जैसे पृथ्वी की जलवायु गर्म होती जा रही है, दिन और रात भी सामान्य से अधिक गर्म होते जा रहे हैं, जिससे हीट वेव की घटनाएं बढ़ रही हैं और मौतों तथा बीमारियों की आशंका भी बढ़ रही है।
