संपादकीय : प्रधान बनाम प्रशासक

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Published By Monis Khan
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उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें अगले छह महीनों के लिए ‘प्रशासक’ नियुक्त करने का निर्णय प्रत्याशित था। पहली दृष्टि में यह निर्णय व्यावहारिक प्रतीत होता है। ऐसा न करने से अव्यवस्था और अराजकता की स्थिति आ जाती, सो यह प्रशासनिक व्यवस्था दूरगामी राजनीतिक और संवैधानिक संकेतों वाला कदम है। अब तक प्रधान का कार्यकाल समाप्त होने पर एडीओ पंचायत को प्रशासक बनाया जाता था, जिससे स्थानीय विकास कार्यों की गति प्रभावित होती थी। सरकार का तर्क है कि गांव की वास्तविक समस्याओं, अधूरे विकास कार्यों और स्थानीय सामाजिक समीकरणों को प्रधान बेहतर समझते हैं, इसलिए उन्हें ही जिम्मेदारी देना अधिक प्रभावी होगा। 

राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में पहले से लागू मॉडल का हवाला देकर इसे ‘सतत विकास’ की दिशा में कदम बताया जा रहा है, हालांकि यह निर्णय प्रशासनिक के साथ ही राजनीतिक भी हो सकता है। पंचायत चुनावों के टलने की पृष्ठभूमि में यह व्यवस्था गांवों में मौजूदा राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने का माध्यम बन सकती है। संभावना है कि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव 2027 के बाद हों ऐसे में छह महीने की यह अंतरिम व्यवस्था और आगे बढ़ेगी। ओबीसी आरक्षण आयोग की रिपोर्ट, मतदाता सूची और विधानसभा चुनावी तैयारी जैसे कारणों का हवाला दिया जा रहा है, परंतु वास्तविकता यह भी है कि पंचायत चुनावों को टालने से सरकार को ग्रामीण राजनीतिक नेटवर्क को नियंत्रित रखने का अतिरिक्त समय मिल जाएगा। 

सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रशासक केवल सामान्य और नियमित कार्य कर सकेंगे, कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। विशेष परिस्थिति में जिलाधिकारी की मंजूरी जरूरी होगी। यही बिंदु भविष्य की जटिलताओं का कारण बनेगा। गांवों में विकास कार्य अक्सर त्वरित निर्णय मांगते हैं, नाली, सड़क, पेयजल, हैंडपंप मरम्मत, या पंचायत भवन जैसे मुद्दों पर यदि हर बार डीएम कार्यालय की स्वीकृति लेनी पड़ी, तो निर्णय प्रक्रिया का धीमा होना स्वाभाविक है। इससे जनता में असंतोष बढ़ सकता है। पंचायतों में भ्रष्टाचार, अपारदर्शिता और फर्जी भुगतान के आरोप वर्षों से लगते रहे हैं, इसलिए सरकार संभवत: इसके जरिए वित्तीय नियंत्रण भी चाहती है। अलग बात है कि व्यवहारिक स्तर पर यह दोहरी व्यवस्था प्रधानों और नौकरशाही के बीच टकराव पैदा कर सकती है। प्रधान स्वयं को निर्वाचित प्रतिनिधि की तरह देखेंगे, जबकि प्रशासन उन्हें सीमित अधिकार वाला प्रशासक मानेगा। 

इस निर्णय का सामाजिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण होगा। ग्राम पंचायत लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई है। चुनाव टलने से नई नेतृत्व पीढ़ी, महिलाओं और पिछड़े वर्गों को अवसर मिलने में देरी होगी। कई गांवों में सत्ता का स्थानीय केंद्रीकरण और मजबूत हो सकता है। दूसरी ओर, जिन पंचायतों में विकास कार्य अधूरे हैं, वहां निरंतरता बनी रहने से कुछ सकारात्मक परिणाम भी संभव हैं। असल चुनौती अब प्रशासनिक दक्षता और लोकतांत्रिक संतुलन दोनों को बनाए रखने की है। यदि सरकार छह महीने के भीतर पारदर्शी तरीके से पंचायत चुनाव कराती है तो यह व्यवस्था संक्रमणकालीन समाधान मानी जाएगी, लेकिन यदि यह अवधि लगातार बढ़ती गई, तो प्रश्न उठेगा कि क्या पंचायतें वास्तव में स्वायत्त लोकतांत्रिक संस्थाएं रह गई हैं, या वे धीरे-धीरे प्रशासनिक विस्तार में बदल रही हैं।