वैराग्य, शांति और मुक्ति की नगरी है पावापुरी 

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Published By Anjali Singh
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जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली (मोक्ष भूमि ) बिहार के नालंदा जिले के पावापुरी में स्थित है। मान्यता है कि 527 ईसा पूर्व कार्तिक अमवस्या के दिन भगवान महावीर ने यहीं पर निर्वाण प्राप्त किया था और अंतिम उपदेश दिया था। इस स्थल का प्रमुख आकर्षण जल मंदिर है। एक तालाब के बीच में सफेद संगमरमर से बना यह मंदिर न सिर्फ जैन धर्म के अनुयायियों की आस्था का केंद्र है, बल्कि बड़ी संख्या में हिंदू धर्म के श्रद्धालु भी यहां दर्शन के लिए आते हैं और भगवान महावीर स्वामी के जीवन दर्शन से प्रेरणा लेते हैं।

वास्तव में जल मंदिर वह स्थान है, जहां भगवान का अंतिम संस्कार हुआ था। इस तरह जल मंदिर न सिर्फ जैन धर्म के अनुयायियों की आस्था और विश्वास का प्रतीक है, बल्कि पर्यटकों के लिए भी अत्यंत मनोहारी आकर्षण का केंद्र है। जल मंदिर की अद्भुत वास्तुकला और शांत वातावरण पर्यटकों और श्रद्धालुओं को सुकून के पल बिताने के लिए प्रेरित करता है। यहां तालाब में खिले श्वेत रंग के कमल पुष्प पर मंडराते भंवरे विहंगम प्राकृतिक व आध्यात्मिक दृश्य उत्पन्न करते हैं। यहां प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह की पूर्णिमा पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें भारत के अलग-अलग क्षेत्रों से ही नहीं, बल्कि दुनियाभर से जैन धर्मावलंबी आते हैं और भगवान महावीर स्वामी का दर्शन पूजन करते हैं। 

जैन तीर्थ सर्किट का महत्वपूर्ण अंग

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यह मंदिर जैन तीर्थ सर्किट का एक महत्वपूर्ण अंग है जो आध्यात्मिक साधकों और इतिहास में रुचि रखने वालों को समान रूप से आकर्षित करता है। जल मंदिर की सुंदरता, इसके ऐतिहासिक महत्व के साथ मिलकर, इसे भारत के सबसे प्रतिष्ठित जैन मंदिरों में से एक बनाती है। इस मंदिर को बिहार की आध्यात्मिक विरासत के रूप प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 

राजा नंदिवर्धन ने किया था निर्माण

महावीर स्वामी का असली नाम राजकुमार वर्धमान था, पर उन्होंने राजसी वैभव को त्याग कर तपस्या के मार्ग को चुना और 42 वर्ष की उम्र में तपस्या पूर्ण करने के उपरांत महावीर कहलाए। भगवान महावीर स्वामी के राजकुमार वर्धमान से महावीर बनने तक की यात्रा का वर्णन यहां लगे साइन बोर्ड पर अंकित हैं। पावापुरी का निर्माण भगवान महावीर स्वामी के अग्रज राजा नंदिवर्धन ने किया था। इसके बाद नियमित इसका जीर्णोद्धार होता रहा। यहां कई अन्य जैन मंदिर स्थापित हैं, जो इस पवित्र तीर्थस्थल की आस्था और सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। इन मंदिरों में भगवान महावीर स्वामी की मूर्तियां स्थापित हैं। 

पाप रहित स्थान की मान्यता 

लगभग 84 बीघे के सरोवर के बीच में स्थापित जल मंदिर तक जाने के लिए करीब 600 फीट का पत्थर का पुल बनाया गया है। मुख्य गेट से मंदिर के लिए जब पुल से चलते हैं, तो दोनों ओर खिले कमल के पुष्प मन को शांति और सुकुन प्रदान करते हैं। साथ ही यह संदेश देते हैं कि हर क्षण मुस्कराते रहें। पावापुरी को अपापापुरी भी कहा जाता है। इसका मतलब है पाप रहित स्थल। यहां भगवान महावीर की चरण पादुकाओं की पूजा होती है।

कैसे पहुंचे

यह स्थान राजगीर जिला से करीब 20 किमी और बिहार शरीफ (नालंदा जिला मुख्यालय) से लगभग 14 किमी दूर स्थित है। दोनों ही स्थानों पर रेलवे स्टेशन हैं। पटना से यह जगह करीब 100 किमी है, और आसान सड़क मार्ग से जुड़ी है। 

दीपावली की सुबह लगती है यहां लड्डू की बोली

दीपावली यानी कार्तिक मास की अमावस्या की मध्य रात को भगवान महावीर का परिनिर्वाण हुआ था। इस उपलक्ष्य में हर साल जल मंदिर में दीपोत्सव होता है, जिसे देखने के लिए जैन धर्मावलंबी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। जल मंदिर में लड्डू चढ़ाने की भी परंपरा है। मंदिर में लड्डू चढ़ाने के लिए श्वेतांबर और दिगंबर श्रद्धालुओं के बीच बोली लगती है, जो श्रद्धालु सबसे ज्यादा बोली लगाता है, उसे मंदिर में लड्डू चढ़ाने का मौका दिया जाता है।

खास तरह से बनता लड्डू 

मंदिर में एक किलो से लेकर 51 किलो का लड्डू चढ़ता है। भगवान महावीर के निर्वाण दिवस पर लड्डू  चढ़ाने की परंपरा के लिए दूसरे प्रदेशों से भी कारीगर पहुंचते हैं। जैन श्वेतांबर और दिगंबर प्रबंधन की निगरानी में शुद्ध देसी घी का लड्डू बनाया जाता है। जैन श्रद्धालु लड्डू को अपने माथे पर लेकर निर्वाण स्थली से लेकर अंतिम संस्कार भूमि तक जाते हैं। जल मंदिर में इसे अर्पित किया जाता है।

दीपावली पर मेला लगता 

पावापुरी में निर्वाण महोत्सव को लेकर दीपावली मेला लगता है। दीपावली के दिन बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु रथ यात्रा में शामिल होते हैं। चांदी के रथ पर भगवान महावीर को लेकर पावापुरी के ही अलग-अलग जैन मंदिरों में भ्रमण कराया जाता है। अंत में जल मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है।

- संजीव जैन नेता, श्री रतनलाल भावन जैन सेवा संस्थान, कानपुर