हिमालय का याक और आस्था स्थलों के चंवर

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रणबीर सिंह, विज्ञान अध्येता

सफेद बालों वालों वाली एक सुंदर चंवर हम में से अनेक ने देखी होगी। सिख गुरुद्वारों में गुरुग्रंथ साहिब जी के निकट खड़े हुए सेवक उस इधर-उधर डुलाते हैं। राजा-महाराजाओं के समय में नौकर लोग सिंहासन के आजू-बाजू खड़े होकर इसे डुलाते थे ताकि मक्खी-मच्छर या कोई अन्य इन्सेक्ट, राजा को परेशान न करे। बाद में हवेलियों के मुख द्वार पर जब चौखट के ऊपरी हिस्से पर लगे हुए सरदर/लिंटल के कुछ ऊपर, केंद्र भाग में गणेश जी का चित्र बनाया जाने लगा, तो चंवरधारिणियों के चित्र इनके आजू-बाजू बनाए जाने लगे। अगर गणेश जी का ही चित्र अंकित किया गया है, तो चंवरधारिणियों के चित्र फसाड/मुखद्वार रचना से कुछ हटकर कौले पर बनाए जाने लगे। सन् 1880 से 1925 के बीच बेरी (हरियाणा) के कुछ महाजनों की भव्य हवेलियों की भित्तियों पर ऐसा अंकन किया गया था। 

चंवर को याक पशु की पूंछ के लंबे बालों से बनाया जाता है। याक पशु हिमालय का बैल है, जिसका फर अत्यंत उत्तम और लंबे रेशे वाला होता है। अच्छी क्वालिटी वाली भारतीय और मध्य पूर्वी चंवर पारंपरिक रूप से तिब्बत और ऊंचे हिमालय से एक्सपोर्ट की गई याक की सफेद पूंछों से बनाई जाती थीं। आने वाले वर्षों में चंवर मिलना मुश्किल हो जाएगा। पूर्वी हिमालय और नेपाल में कंचनजंगा क्षेत्र में याक चराना सबसे पुरानी बाजार आधारित परंपराओं में से एक रहा है, जो एक एकीकृत सामाजिक-पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा रहा है। इसके खत्म होने की आशंका है, क्योंकि याक चराने वाले धीरे-धीरे दूसरे कामों की ओर बढ़ रहे हैं। चराने का काम बंद होने के कई नतीजे हो सकते हैं, जैसेकि संस्कृति का नुकसान और चरागाह पारिस्थितिकी तंत्र का खराब होना।

याक चराने के अर्थशास्त्र को समझना जरूरी है। नेपाल के कंचनजंगा इलाके में याक चराने वाले 60 लोगों के साथ इंटरव्यू के आधार पर याक चराने के फायदे-नुकसान का विश्लेषण किया गया। नतीजों से पता चलता है कि याक चराना आर्थिक रूप से आकर्षक नहीं है। बछड़ों और वयस्क याक की ज्यादा मौतें इस काम के लिए खतरा बनी हुई हैं और खराब होते चरागाह लागत बढ़ा रहे हैं। याक चराने से संस्कृति को बचाने, चरागाह पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने और गैर-कानूनी गतिविधियों को रोकने के मामले में काफी सामाजिक और पारिस्थितिक फायदे होते हैं। अगर इन फायदों को शामिल किया जाए, तो फायदा-लागत अनुपात और इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न क्रमशः 1.32 और 10.44 होगा। क्योंकि याक चराने से सीधा फायदा कम होता है और चरवाहों को दूर-दराज इलाकों में रहना पड़ता है, इसलिए इस बात का काफी जोखिम है कि आने वाली युवा पीढ़ियां इस पेशे को छोड़ देंगी।


ब्रिटिश समय में भारत से तिब्बत और सेंट्रल एशिया में जो खोजी अभियान/मिलिट्री अभियान गए वे सब पुराने व्यापार मार्गों से ही गए और इन सबमें हिमालय के इकॉनोमिक प्रोडक्ट्स के बारे में जिक्र किया गया है। भारतीय संस्कृति में चंवर का प्रवेश कब और कैसे हुआ, इसके बारे में कुछ विवरण ज्ञात हैं, लेकिन अधिकतर संकेत उन चित्रों से मिलते हैं, जिन्हें हिमालय में बौद्ध मठों में बनाया गया था। वहां की यात्रा करने वालों की मार्फत और दार्जिलिंग के बाजार से यह प्रोडक्ट भारतीय राजघरानों और आस्था स्थलों में पहुंचा होगा।

भारतीय हिमालयी ऊंचे इलाकों (लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल की पहाड़ियां और सिक्किम) में याक पालन एक बहुत पुरानी परंपरा है और कई स्थानीय समुदाय जीवनयापन के लिए इस पशु पर निर्भर हैं। यह ऊंचे इलाकों में रहने वाले समुदायों की परंपरा, धर्म और सामाजिक जीवन का एक अहम हिस्सा है। हालांकि हाल के सालों में जलवायु परिवर्तन और अन्य सामाजिक-आर्थिक कारणों से याक पालन में लोगों की दिलचस्पी कम हुई है।इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट, नेपाल सरकार के पशुधन सेवा विभाग और भूटान सरकार के पशुधन विभाग से भी याक पालन और संरक्षण के लिए  सुझाव मिले।

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