यूपी के पानी पर अब ‘फॉरएवर केमिकल’ की भी नजर! माइक्रोप्लास्टिक से PFAS तक होगी जांच
नई स्टेट लैब में विकसित होगी अत्याधुनिक परीक्षण क्षमता, प्रदेश में 1 राज्य, 3 क्षेत्रीय, 72 जिला और 62 वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट प्रयोगशालाओं का नेटवर्क
लखनऊ, अमृत विचार: रोज सुबह नल या आरओ से गिलास में पानी भरते समय शायद ही किसी के मन में यह सवाल आता हो कि इसमें सब कुछ ठीक है या नहीं। पानी साफ दिखाई दे रहा है तो हम उसे पीने के लिए पूरी तरह से सुरक्षित मान लेते हैं। लेकिन पानी में मौजूद हर चीज आंखों से दिखाई नहीं देती। बहुत छोटे प्लास्टिक कण और कुछ ऐसे रसायन भी हो सकते हैं, जिनकी पहचान सामान्य जांच से नहीं हो पाती।
इसी को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश अब पेयजल की जांच का दायरा बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। प्रदेश की नई स्टेट लैबोरेटरी में पानी के भीतर मौजूद माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे उभरते प्रदूषकों की जांच की सुविधा विकसित की जाएगी। इसके लिए जरूरी आधुनिक उपकरण खरीदने का प्रस्ताव वार्षिक कार्ययोजना में शामिल किया गया है।
आखिर माइक्रोप्लास्टिक पानी में क्या कर रहा है?
माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के बेहद छोटे कण होते हैं। सामान्य तौर पर पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कणों को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। ये इतने छोटे हो सकते हैं कि इन्हें सामान्य नजर से देख पाना संभव नहीं होता।
प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ने के साथ पर्यावरण में इसके छोटे-छोटे कण भी चिंता का विषय बने हैं। ऐसे में पानी में इनकी मौजूदगी की जांच के लिए विशेष तकनीक की जरूरत होती है।
PFAS यानी ‘फॉरएवर केमिकल’ क्या है?
PFAS फ्लोरीन वाले कृत्रिम रसायनों का एक बड़ा समूह है। पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहने की क्षमता के कारण इन्हें आम तौर पर ‘फॉरएवर केमिकल’ कहा जाता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि माइक्रोप्लास्टिक और PFAS एक ही तरह के प्रदूषक नहीं हैं। दोनों की प्रकृति अलग है और पानी के नमूने लेने से लेकर उनकी जांच करने तक की प्रक्रिया भी अलग होती है। इसलिए नई लैब में इनके लिए अलग-अलग आधुनिक परीक्षण सुविधाओं की जरूरत होगी।
अभी यूपी में कैसे होती है पानी की जांच?
ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए उत्तर प्रदेश में पहले से ही बड़ा प्रयोगशाला नेटवर्क मौजूद है। इसमें एक राज्य स्तरीय, तीन क्षेत्रीय, 72 जिला स्तरीय और 62 वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट प्रयोगशालाएं शामिल हैं।
यानी प्रदेश में कुल 138 प्रयोगशालाओं के जरिए ग्रामीण पेयजल की गुणवत्ता की निगरानी की जा रही है। राज्य स्तरीय लैब में उन्नत जांच सुविधाएं हैं और इसके 50 मानक एनएबीएल प्रमाणित हैं।
जल जीवन मिशन के तहत भी ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता की नियमित निगरानी की जाती है। जरूरत पड़ने पर पानी के नमूनों की विस्तृत जांच प्रयोगशाला में कराई जाती है।
नई लैब बनने से आम लोगों को क्या फायदा होगा?
नई स्टेट लैब का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि प्रदेश में पानी की गुणवत्ता को लेकर नई तरह की चुनौतियों की पहचान करने की क्षमता बढ़ेगी।
उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) के प्रबंध निदेशक योगेश कुमार ने बताया कि नई स्टेट लैबोरेटरी भवन का निर्माण तेजी से कराया जा रहा है। इसे आधुनिक और विश्वस्तरीय परीक्षण सुविधाओं से लैस करने की दिशा में काम चल रहा है।
माइक्रोप्लास्टिक और PFAS की जांच शुरू होने के बाद प्रदेश में यह समझने में मदद मिलेगी कि ये प्रदूषक कहां और किस स्तर पर मौजूद हैं। साथ ही इनके संभावित स्रोतों की पहचान करने और भविष्य में इनकी निगरानी के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार करने में भी मदद मिलेगी।
पहली बार तैयार हो सकेगा इन प्रदूषकों का बेसलाइन डाटा
नई जांच व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बेसलाइन डाटा तैयार करना भी होगा। आसान भाषा में समझें तो इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर इन उभरते प्रदूषकों की स्थिति क्या है।
आगे चलकर यही जानकारी निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और भविष्य में बनने वाले राष्ट्रीय मानकों व दिशानिर्देशों के अनुरूप जांच प्रणाली विकसित करने में उपयोगी हो सकती है।
अभी घबराने की नहीं, समझने की जरूरत
माइक्रोप्लास्टिक और PFAS की जांच की सुविधा विकसित करने की योजना को इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि प्रदेश के पेयजल में ये प्रदूषक पाए गए हैं। फिलहाल पहल का उद्देश्य इनकी जांच की वैज्ञानिक क्षमता तैयार करना और इनके बारे में भरोसेमंद डाटा जुटाना है।
यानी आने वाले समय में पानी की गुणवत्ता जांच सिर्फ उन चीजों तक सीमित नहीं रहेगी जिन्हें अब तक नियमित रूप से जांचा जाता रहा है। नई तकनीक के जरिए उन प्रदूषकों पर भी नजर रखने की कोशिश होगी, जो दिखाई नहीं देते, लेकिन जल गुणवत्ता के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
आखिरकार साफ दिखने वाला पानी ही हमेशा पूरी कहानी नहीं बताता। पानी में क्या है, इसकी सही जानकारी के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी है। उत्तर प्रदेश की नई स्टेट लैब इसी दिशा में एक कदम है।
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