सुकोमल घास आंधी-तूफान में भी अपने को बचा लेती है
भयंकर आंधी तूफान और नदियों की बाढ़ बड़े-बड़े मकानों और लंबे चौड़े पेड़ों के लिए काल बन कर आती है। इस तरह के प्राकृतिक प्रहार के बाद तमाम मकान ध्वस्त हो जाते हैं और मजबूत से दिखने वाले पेड़ उखड़ कर धराशाई हो जाते हैं, लेकिन इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं बाग-बगीचों में उगी हुईं सुकोमल घासों के आगे घुटने टेक देती हैं, जैसे कितनी शक्तिशाली थीं ये घासें। किसी भी दृष्टि से घास को शक्तिशाली तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसे कमजोर इंसान नहीं बल्कि छोटे-छोटे बच्चे भी उखाड़ सकते हैं, पशु चर जाते हैं, लेकिन आंधी-तूफान और नदियों की बाढ़ तो इन घासों को सलामी बोलते हुए जैसे आगे चली गई। एक दो दिन में फिर पूर्ववत हो जाती हैं, स्वतः निकली हुई घास।
सोचने वाली बात यह है कि मकान सीमेंट से बने थे। सीमेंट मजबूती का पर्याय है। यहां तक कि मजबूत रिश्तों के लिए भी प्रयोग होता है कि सीमेंट में ढला हुआ मजबूत रिश्ता है। उखड़े हुए पेड़ों की मजबूती पर नजर डालें तो इन्हीं पेड़ों की लकड़ियों का प्रयोग अनेकानेक मजबूत कार्यों के लिए किया जाता है, लेकिन प्राकृतिक आपदा में इन मकानों और पेड़ों की मजबूती काम नहीं आई।
आपदा की चुनौतियों को परास्त करने वाली सुकोमल-सी घास यदि यथावत स्थिति में है, तो इस मजबूती का कारण उसका सुकोमल होना ही है। इस अवधारणा को इंसान के जीवन के संदर्भ में देखा जाए तो हमेशा सुकोमल व्यवहार को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। सनातन संस्कृति में विनयशीलता को अत्यधिक महत्व दिया गया है। यहां तक कहा गया है कि ‘विद्या ददाति विनयम्’। विद्याध्ययन के बाद यदि इंसान में क्रोध, रुक्षता और उद्वेग बना हुआ है तो यह मान लिया जाता है कि उस इंसान का विद्याध्ययन व्यर्थ है।
मानव आचरण के दुर्गुणों की श्रेणी में शामिल क्रोध आदि से इंसान के शरीर पर बहुत ही विपरीत असर पड़ता है। शरीर के हार्मोंस तक प्रभावित होते हैं। ढेरों बीमारियों का जन्मदाता अकेले क्रोध ही है। यदि वास्तव में देखा जाए तो वह धर्मग्रंथों में वर्णित पिशाच नामक दैत्य है। इसे जीवन में देखा भी जा सकता है। क्रोध आने पर पेट में जलन होने लगती हैं। सांसे तेज चलने लगती है। इन कारणों से रक्त का प्रवाह अव्यवस्थित होता है।
