ग्लेशियर टूटने से महाप्रलय, दूसरी बड़ी बाढ़ की चेतावनी; ICIMOD वैज्ञानिकों ने बताई नेपाल की विनाशकारी त्रासदी की पूरी सच्चाई

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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काठमांडू। तिब्बत से मध्य नेपाल के जिलों में तबाही मचाने वाली अचानक आई बाढ़ का कारण हिमस्खलन हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) के विशेषज्ञों ने यह जानकारी दी। आईसीआईएमओडी ने इस आपदा को हिममंडल से जुड़ी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति का उदाहरण बताते हुए शुरुआती चेतावनी प्रणालियों और मजबूत क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत पर जोर दिया। उसने कहा कि सीमा पार होने वाली ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए सरकारों को समन्वित तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए।

हिमालयी देश में बुधवार को आई अचानक बाढ़ ने कई जिलों में तबाही मचा दी, जिसमें 160 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और 500 से अधिक लोग लापता हैं। इनमें 133 भारतीय भी शामिल हैं। बाढ़ में कई पुल बह गए और कम से कम एक दर्जन जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा है। 

ICIMOD ने बताई पूरी सच्चाई 

काठमांडू स्थित आईसीआईएमओडी और नेपाल तथा चीन के सहयोगी संस्थानों के वैज्ञानिक यह पता लगा रहे हैं कि क्या यह बाढ़ किसी ऊंचाई वाले क्षेत्र से शुरू हुए हिमस्खलन के कारण आई थी। आईसीआईएमओडी ने एक बयान में कहा कि प्रभावित क्षेत्रों से प्राप्त वीडियो फुटेज और जानकारी के आधार पर किए गए प्रारंभिक आकलन से संकेत मिलता है कि शायद बड़ी मात्रा में बर्फ और चट्टानी मलबा भोटे कोशी नदी की सहायक नदी लेंदे खोला में गिरा होगा। शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे अचानक पानी का तेज बहाव पैदा हुआ होगा, जो अपने साथ मलबा और बड़े पत्थर नीचे की ओर ले गया। 

आईसीआईएमओडी ने कहा कि जल विज्ञान संबंधी आंकड़ों से बाढ़ की लहर की असाधारण गति और तीव्रता का पता चलता है। त्रिशूली नदी में गलछी के पास जलस्तर कथित तौर पर 30 मिनट में 9 मीटर तक बढ़ गया, जबकि मालेखु में इसी अवधि में जलस्तर सात मीटर बढ़ा। उसने कहा कि त्रिशूली नदी के किनारे जल निगरानी के कई केंद्र इस घटना के दौरान क्षतिग्रस्त हो गए या बह गए, हालांकि गलछी निगरानी केंद्र अब भी काम कर रहा है। विशेषज्ञ यह भी पता लगा रहे हैं कि क्या मलबे ने नदी के किसी संकरे हिस्से को अस्थायी रूप से रोक दिया था। 

दूसरी आपदाओं का खतरा पैदा

आईसीआईएमओडी के अनुसार, इस तरह की रुकावट से बांध में जमा पानी अचानक निकलने पर दूसरी आपदाओं का खतरा पैदा हो सकता है। क्षेत्रीय अंतर-सरकारी संगठन आईसीआईएमओडी ने कहा कि अधिकारी और वैज्ञानिक संभावित अवरोध के आकार, स्थान और स्थिरता का आकलन कर रहे हैं। यह संगठन हिमालयी क्षेत्र के सभी आठ देशों - अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, म्यांमा, नेपाल और पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करता है। 

बाढ़ की जद में रसुवा

आईसीआईएमओडी में जलवायु एवं पर्यावरणीय जोखिम विभाग के प्रमुख चियांगगोंग झांग ने कहा, ''पिछले साल रसुवा में बाढ़ से तबाह हुआ वही इलाका एक बार फिर खतरे में है। लेंदे खोला में बर्फ का हिमस्खलन संभावित कारण माना जा रहा है, लेकिन इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है।''

उन्होंने कहा कि नेपाल-चीन सीमा पर नदी के ऊपरी हिस्से में अभी भी एक अवरोध मौजूद है और अधिकारियों ने दूसरी बाढ़ की आशंका जताते हुए जिलोंग बंदरगाह को खाली कराने के आदेश दिए हैं आईसीआईएमओडी के वरिष्ठ हिममंडल विशेषज्ञ मोहम्मद फारूक आजम ने कहा, ''हिममंडल से जुड़ी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति अब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो रही है। बदलाव की गति इतनी तेज है कि मौजूदा प्रयास इसके साथ कदम मिलाने में संघर्ष कर रहे हैं।'' उन्होंने कहा, ''लेंदे खोला में आज की आपदा सीमा पार होने वाले खतरों से निपटने के लिए मजबूत क्षेत्रीय सहयोग और सरकारों की समन्वित कार्रवाई की जरूरत को रेखांकित करती है।'' 

लेंदे खोला में 14 महीने में दो बार बाढ़

आईसीआईएमओडी के आपदा जोखिम न्यूनीकरण विशेषज्ञ शाश्वत सन्याल ने कहा कि लेंदे खोला में 14 महीने में दो बार बाढ़ आई है और इस बार संभवतः हिमस्खलन ने नदी को रोक दिया, जिसके बाद अचानक पानी का तेज बहाव नीचे की ओर आया। प्रारंभिक भूकंपीय आंकड़ों के विश्लेषण में आपदा के दौरान असामान्य संकेत मिले हैं। प्रभावित क्षेत्र से करीब 12 किलोमीटर दूर जिलोंग में लगे भूकंपमापी यंत्र ने असामान्य संकेत दर्ज किए, जबकि झांगमु में स्थित एक अन्य केंद्र ने भी असामान्य गतिविधि दर्ज की। 

बाढ़ के कारणों का पता करने में जुटें वैज्ञानिक

वैज्ञानिक यह पता लगा रहे हैं कि क्या इन संकेतों का संबंध संदिग्ध हिमस्खलन से है। हालांकि, फिलहाल भूकंपीय गतिविधि और बाढ़ के बीच कोई कारणात्मक संबंध स्थापित नहीं हुआ है। वैज्ञानिकों ने आगाह किया कि जलवायु परिवर्तन हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों, बर्फ की स्थिति, स्थायी रूप से जमी जमीन और पर्वतीय ढलानों में बदलाव ला रहा है, लेकिन इस विशेष घटना में जलवायु परिवर्तन की क्या भूमिका रही, यह तय करना अभी जल्दबाजी होगी। नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में आपदा अध्ययन केंद्र के निदेशक बसंत राज अधिकारी ने कहा कि हिमालय में बहु-जोखिम वाली आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है और लेंदे खोला का मामला इसका एक उदाहरण है। 

भूकंप नहीं ग्लेशियर से आयी तबाही 

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) ने कहा कि नेपाल में अचानक आई बाढ़ का कारण 4.4 तीव्रता वाला भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियर ढहना था। दरअसल प्रारंभिक तौर पर कहा गया था कि भूकंप के बाद बाढ़ आई है। यूएसजीएस ने कहा कि लंबी अवधि वाली भूकंपीय तरंगों के अतिरिक्त विश्लेषण से पता चला कि ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहाव के कारण कंपन उत्पन्न हुए थे। 

बुधवार को तिब्बत में अचानक आई बाढ़ ने नेपाल के रसुवा और धादिंग जिलों में भारी तबाही मचाई। इसमें 162 लोगों की मौत हो गई, जबकि 750 लोग लापता हैं। लापता लोगों में 133 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। यूएसजीएस ने घटना से संबंधित अपने नवीनतम बयान में कहा, ''शुरुआत में इस घटना को 4.4 तीव्रता का भूकंप बताया गया था। आसपास के भूकंपीय स्टेशनों से प्राप्त आंकड़ों, लंबी अवधि वाली भूकंपीय तरंगों और उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों के अतिरिक्त विश्लेषण के बाद यह निष्कर्ष निकला कि यह कंपन ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहाव के कारण हुआ था तथा कोई भूकंप नहीं आया था।''

उसने कहा, ''यूएसजीएस ने निष्कर्ष निकाला कि कंपन की यह घटना ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहाव के कारण हुई, जिसके बाद निचले इलाकों की ओर विनाशकारी प्रभाव देखने को मिले।'' कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी में भू-आकृति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर डेनियल शुगर ने कहा कि बाढ़ 5,200 मीटर की ऊंचाई पर एक चट्टान से ग्लेशियर के खिसककर नीचे गिरने के कारण आई। 

शुगर ने प्राकृतिक आपदा से एक दिन पहले यानी मंगलवार और बुधवार को क्षेत्र की ली गई उपग्रह तस्वीरों की तुलना की। 'न्यू साइंटिस्ट' पत्रिका ने शुगर के हवाले से कहा, ''उपग्रह तस्वीरों की तुलना करने पर ऐसा लगता है कि आसपास के ग्लेशियरों में पिछले 24 घंटों के दौरान काफी बर्फ पिघली है।'' उन्होंने कहा, ''मेरा अनुमान है कि बर्फ और ग्लेशियर की बर्फ के पिघलने से ग्लेशियर में काफी मात्रा में पानी हो गया। यह पानी नीचे रिसकर ग्लेशियर की सतह तक पहुंचा और उसे चिकना कर दिया। यही ग्लेशियर के ढहने के लिए पर्याप्त वजह थी।'

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