जमाने से मुझे छुप करके तुझे वो रंग लगाना है !!

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कन्हैया ने कहा राधा मैं तुझपर रंग डालूंगा कि पिछली साल की होली का अब बदला निकालूंगा कहा राधा ने कान्हा मुझसे क्या बदला निकालेगा रंगी जो खुद तेरे रंग में उसे क्या रंग डालेगा   गुज़ारा था जो इक लम्हा तुम्हारे संग होली का, मेरे गालों पे कायम है वो अब तक रंग होली …

कन्हैया ने कहा राधा मैं तुझपर रंग डालूंगा

कि पिछली साल की होली का अब बदला निकालूंगा

कहा राधा ने कान्हा मुझसे क्या बदला निकालेगा

रंगी जो खुद तेरे रंग में उसे क्या रंग डालेगा

 

गुज़ारा था जो इक लम्हा तुम्हारे संग होली का,

मेरे गालों पे कायम है वो अब तक रंग होली का ,

जमाना ही खड़ा सारा लिए हाथों में पिचकारी,

नहीं जो तुम करूं मैं क्या भला बेढंग होली का !!

 

विघन जब भी कोई पड़ता मेरे आराम के रंग में,

मैं पहरों डूब जाती हूं तुम्हारे नाम के रंग में,

लगाया था जो राधा ने कभी कृष्णा के गालों पर,

रंगी है सारी दुनिया ही उसी घनश्याम के रंग में !!

 

न खुद तरसो मेरे हमदम, न तरसाने की होली है,

ये सावन की फुहारों सी बरस जाने की होली है,

यूं रंग दे तू मुझे कान्हा यही एहसास हो मुझको,

ये वृंदावन की होली है ये बरसाने की होली है !!

 

मोहब्बत वाले रस्तों का तो ये दुश्मन ज़माना है,

कभी लैला निशाने पर कभी मजनू निशाना है,

होली की ख़बर सुनकर मेरी आंखों में जो उतरा,

जमाने से मुझे छुप करके तुझे वो रंग लगाना है !!

-गौरी मिश्रा, कवयित्री हल्द्वानी