आरम्भ से अनंत तक तुम्ही तो इक रणधीर हो…
नव छंद के रसाल से त्वरित समरवीर हो आरम्भ से अनंत तक तुम्ही तो इक रणधीर हो।। समरवीर तब भी थे जब यवनों का काल था रणक्षेत्र, कर्मक्षेत्र है अर्जुन का गांडीव है उठो, लड़ो अन्याय से धरा के बलवीर हो।। भागवत का ज्ञान है लक्ष्य भी महान है बीजमंत्र नहीं कोई न कोई यन्त्र …
नव छंद के रसाल से
त्वरित समरवीर हो
आरम्भ से अनंत तक
तुम्ही तो इक रणधीर हो।।
समरवीर तब भी थे
जब यवनों का काल था
रणक्षेत्र, कर्मक्षेत्र है
अर्जुन का गांडीव है
उठो, लड़ो अन्याय से
धरा के बलवीर हो।।
भागवत का ज्ञान है
लक्ष्य भी महान है
बीजमंत्र नहीं कोई
न कोई यन्त्र है यहाँ
जतन करो हजार तुम
यूं ही न अधीर हो।।
राह भी कठिन यहाँ
मुश्किलें भरी पडी
कौरवों की भीड़ में
दुशासन कई यहाँ
एक में अनेक तुम
साम्राज्य के बजीर हो।।
नव छंद के रसाल से…
-बीएस गौनिया, हल्द्वानी
