देखते देखते राज्यों की मर्जी का भी मोहताज हो गया ‘केंद्र का तोता’

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संजय सिंह, अमृत विचार, नई दिल्ली। मद्रास हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सीबीआइ फिर फोकस में है। इसकी स्वायत्तता, संसाधनों और अधिकारों को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। हाईकोर्ट ने सुप्रीमकोर्ट की ‘पिंजरे में बंद तोते’ वाली टिप्पणी को दोहराते हुए केंद्र सरकार से सीबीआइ को चुनाव आयोग अथवा कैग जैसी स्वायत्तता …

संजय सिंह, अमृत विचार, नई दिल्ली। मद्रास हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सीबीआइ फिर फोकस में है। इसकी स्वायत्तता, संसाधनों और अधिकारों को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। हाईकोर्ट ने सुप्रीमकोर्ट की ‘पिंजरे में बंद तोते’ वाली टिप्पणी को दोहराते हुए केंद्र सरकार से सीबीआइ को चुनाव आयोग अथवा कैग जैसी स्वायत्तता प्रदान करने के लिए कानून में संशोधन करने को कहा है।

न्यायालय ने कहा कि लोग पुलिस के बजाय सीबीआइ जांच पर भरोसा करते हैं जिससे सीबीआइ जांच की मांग दिनोदिन बढ़ती जा रही है। जबकि सीबीआइ अधिकारों और संसाधनों की कमी का हवाला जांच से बचने की कोशिश करती है। इसलिए अलग काडर व अलग बजट के साथ सीबीआइ के डायरेक्टर को केंद्र सरकार के सचिव के बराबर दर्जा देने पर तत्काल विचार किया जाना चाहिए।

सुप्रीमकोर्ट की टिप्पणी के बाद सीबीआइ को लेकर किसी उच्च अदालत का ऐसा सख्त रुख पहली बार सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में कोयला ब्लॉक आबंटन घोटाले की सुनवाई के दौरान सीबीआइ को “मालिक के इशारे पर चलने वाला पिंजरे में बंद तोता” कहकर तत्कालीन संप्रग सरकार की ओर इशारा किया था। जबकि मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणियों से पता चलता है कि आठ साल बाद भी कुछ नहीं बदला है। केंद्र में संप्रग की जगह राजग सरकार आ गई है। मगर सीबीआइ की हालत जस की तस है।

सीबीआइ की स्थापना दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट ऐक्ट, 1946 के तहत 1 अप्रैल, 1963 को गृह मंत्रालय के अधीन की गई थी। लेकिन 1985 में इसे नवगठित कार्मिक मंत्रालय के अधीन कर प्रधानमंत्री के नियंत्रण में ला दिया गया। इसके बावजूद एजेंसी के पास संसाधनो व अधिकारों की कमी है।

इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब भी इसका सालाना बजट मात्र 835 करोड़ रुपये का है। यही नहीं, 7,273 लोगों के स्वीकृत क्षमता (पुलिस, विधि व तकनीकी अधिकारियों तथा मंत्रालयी व कैंटीन कर्मियों समेत) के मुकाबले एजेंसी के पास फिलहाल मुख्यालय और 16 जोनल हेडक्वार्टर में कुल मिलाकर केवल 5,896 लोगों का स्टाफ है। यानी 1,377 लोग ( करीब 19 फीसद) कम हैं।

इस तरह छह हजार से भी कम लोगों पर देश भर के सैकड़ों मामलों का भार है। जिनमें हत्या, लूटपाट, धोखाधड़ी से लेकर वित्तीय घोटालों जैसे पेचीदा अंतरराज्यीय और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के मामले शामिल हैं। इन मामलों में डिजिटल फोरेंसिक विश्लेषण, फोरेंसिक एकाउंटिंग और फ्रॉड एनालिसिस के अलावा हजारों ईमेल, टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो, इमेज फाइल तथा हार्ड डिस्क, कॉल डेटा तथा वित्तीय एवं बैंक ट्रांजेक्शनो को खंगालने के लिए सैकड़ों दक्ष लोगों की आवश्यकता पड़ती है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए एजेंसी ने काडर रिस्ट्रक्चरिंग के अलावा सेंट्रलाइज्ड टेक्नोलॉजी वर्टिकल (सीटीवी), इंटरनेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन फॉरेंसिक साइंस तथा इंटरनेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन इन्वेस्टिगेशन नाम से तीन संस्थानों की स्थापना का प्रस्ताव किया था। लेकिन ये आज तक स्थापित नहीं हुए हैं।

सीबीआइ की दयनीय हालत के लिए समय-समय पर किए गए कानूनी एवं प्रशासनिक संशोधन जिम्मेदार हैं। जिनसे एजेंसी के लिए केंद्र ही नहीं, बल्कि राज्यों की मर्जी के बगैर जांच करना संभव नहीं रह गया है। एक्ट के अनुसार किसी प्रदेश से संबंधित मामले में जांच के लिए सीबीआइ को राज्य सरकार की सामान्य अथवा विशिष्ट मंजूरी जरूरी है।

पहले ज्यादातर सरकारों ने एजेंसी को सामान्य मंजूरी दे रखी थी जिससे हर केस के लिए विशिष्ट मंजूरी नहीं लेनी पड़ती थी। परंतु सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद से मिजोरम, प. बंगाल, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, केरल, झारखंड और पंजाब समेत आठ राज्यों ने सामान्य मंजूरी वापस ले ली है। अब हर केस के लिए सीबीआइ को राज्य सरकारों के समक्ष गिड़गिड़ाना पड़ता है। जबकि संगीन मामलों में भी राज्य सरकारें अपनी ही पुलिस या सीआइडी से जांच का आग्रह करने लगी हैं। यही वजह है कि सीबीआइ नए मामले लेने से घबराती है।

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