क्या आप जानते हैं करीब दो सौ साल से भी पुराना है इलेक्ट्रिक कार का इतिहास

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Edited By Amrit Vichar
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डीजल-पेट्रोल की कीमतों को आसमान छूते देख सोचता हूं कि क्यों न एक इलेक्ट्रिक कार खरीद लूं। किफायती रहेगी और पर्यावरण के अनुकूल भी। मगर जब इस खयाल को निर्णय तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं, रास्ते में कुछ अवरोध आ खड़े होते हैं। इनमें से तीन कुछ ज्यादा ही प्रतोसाहित करने वाले हैं। पहला, …

डीजल-पेट्रोल की कीमतों को आसमान छूते देख सोचता हूं कि क्यों न एक इलेक्ट्रिक कार खरीद लूं। किफायती रहेगी और पर्यावरण के अनुकूल भी। मगर जब इस खयाल को निर्णय तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं, रास्ते में कुछ अवरोध आ खड़े होते हैं। इनमें से तीन कुछ ज्यादा ही प्रतोसाहित करने वाले हैं। पहला, इसकी ऊंची कीमत। दूसरा, जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर और तीसरा, इन कारों के सीमित विकल्प। ये तीन अवरोधक शायद मेरे जैसे कई और इच्छुक ग्राहकों के लिए फैसले की राह दुर्गम कर रहे हों और शायद इसी कारण तमाम सरकारी रियायतों के बावजूद देश में इलेक्ट्रिक कार की बिक्री मनचाही रफ्तार नहीं पकड़ पा रही। पर सुखद यह कि तमाम ऑटोमोबाइल कंपनियां इन कारों के सस्ते और सर्वसुलभ विकल्प विकसित करने में जुटी हैं, जिनके अपेक्षित नतीज़े जल्द आने की उम्मीद है।

वैसे यह जानना खासा दिलचस्प होगा कि जिस इलेक्ट्रिक कार को हम ताज़ा तकनीकी अविष्कार और भविष्य की कार के तौर पर देखते हैं, वह सही मायने में दुनिया की पहली कार है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इलेक्ट्रिक कार की अवधारणा करीब दो सौ साल पुरानी है।

हालांकि पहली इलेक्ट्रिक कार किसने ईजाद की, इसे लेकर थोड़ा विवाद है। फिर भी ज्यादा सहमति इस बात पर है कि पहली इलेक्ट्रिक कार बनाने में सफलता हंगरी के एनोस जेडलिक ने पाई। इसके बाद 1832 में स्कॉटलैंड के रॉबर्ट एंडरसन ने यह कर दिखाया। दो साल बाद (1834 में) अमेरिका के थॉमस डेवनपोर्ट ने भी इलेक्ट्रिक कार बनाने का दावा पेश कर दिया। हालांकि ये कारें बहुत व्यवहारिक नहीं बन सकी थीं।

लिहाज़ा, बेहतरी की कवायद चलती रही, प्रयोग होते रहे। 1890-91 में अमेरिका के ही वैज्ञानिक विलियम मॉरिसन ने एक ऐसी कार बनाने में सफलता पाई, जिसमें छह लोग बैठ सकते थे और यह 23 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफतार से दौड़ सकती थी। इस बीच 1885 में जर्मन इंजीनियर कार्ल बेंज ने पेट्रोल से चलने वाली पहली कार पेश कर दी थी, जिसकी लागत इलेक्ट्रिक कार से कम थी और रफ्तार ज्यादा।

फिर भी अमेरिका के संभ्रांत वर्ग ने इलेक्ट्रिक कार को ही बेहतर विकल्प माना। कम रफ्तार के बावजूद 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों में इन कारों की धूम रही। 1912 में इलेक्ट्रिक कार की बिक्री वहां शीर्ष पर पहुंच गई। इन कारों का व्यावसायिक इस्तेमाल तक चल पड़ा और न्यूयॉर्क सिटी में इसे टैक्सी सेवा में उतार दिया गया।

इसके उलट यूरोपीय और एशियाई देश पेट्रोल कार के औद्योगिक उत्पादन की तरफ बढ़े चले गए। वहां की कार कंपनियां रफ्तार का क्रेज़ बढ़ाने में कामयाब रहीं। इन कारों के आसान रखरखाव ने भी उपभोक्ताओं को अपनी तरफ खींचा। 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में ही दुनियाभर में पेट्रोल कार का जलवा कायम हो गया तो अमेरिकी निर्माताओं ने भी इलेक्ट्रिक से पेट्रोल पर आना ही मुनासिब समझा। धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक कार इतिहास बन गई। लेकिन सदी के अंत तक आते-आते जीवाश्म ईंधन के खत्म होते स्रोतों और बढ़ती पर्यावरणीय चिंता ने एक बार फिर इलेक्ट्रिक कार को ठोस विकल्प के तौर पर रेखांकित किया और इसे सर्वसुलभ बनाने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास तेज हो गए।

इन्हीं प्रयासों के बीच वर्ष 2000 में हाइब्रिड कार का उत्पादन अमेरिका में शुरू हुआ। ली-आयन मोटर्स यह तकनीक लेकर आई जो जल्द ही दुनियाभर में पहुंच गई। इसके आठ साल बाद अमेरिका की ही एक अन्य कम्पनी टेस्ला मोटर्स ने 2008 में इलेक्ट्रिक कार का उत्पादन शुरू कर दिया। यह वो दौर था जब भारत में तमाम कार कम्पनियों ने धूम मचा रखी थी, लेकिन इलेक्ट्रिक कार के विकल्प को लेकर कोई गंभीर नहीं थी।

हां, इलेक्ट्रिक ऑटो (थ्रीव्हीलर) 1996 में जरूर लांच हो चुका था। तब स्कूटर्स इंडिया लिमिटेड ने पहली बार 400 ई-ऑटो “विक्रम साफ” के नाम से बनाए और बेचे थे। इसके बाद रेवा इलेक्ट्रिक कार कम्पनी (जिसे बाद में महिंद्रा एंड महिंद्रा ने खरीद लिया) ने पहली बार एक कॉम्पैक्ट इलेक्ट्रिक कार भारतीय बाजार में उतारी। दिलचस्प यह कि यह कम्पनी भी स्कूटर्स इंडिया की ही तरह भारतीय थी।

सुखद यह कि उत्सर्जन मानकों के प्रति भारत सरकार की गंभीरता पर अब तमाम कार निर्माता कम्पनियां इलेक्ट्रिक कार की दौड़ में शामिल हो रही हैं। आज इन कारों के कुल 9 मॉडल हमारे-आपके लिए बाजार में उपलब्द्ध हैं, जिनमें टाटा की टिगोर, नैक्सोन, जगुआर, ह्युंडई की कोना, महिंद्रा की वेरिटो, एमजी की जेडएस ईवी, स्टॉर्म की आर3 और मर्सिडीज की ईक्यूसी शामिल है। जल्द ही वॉल्वो, मारुति, ऑडी, रेनो और टेस्ला के भी अपनी ई-कार भारत में पेश करने की योजना है।

फिलहाल जो कारें भारतीय बाजार में उपलब्ध हैं, उनकी कीमतें 10.45 लाख से 1.17 करोड़ के बीच है, जो समानांतर पेट्रोल कारों के मुकाबले डेढ़ से दोगुना ज्यादा हैं। दिल्ली समेत कई राज्यों में सरकारें इलेक्ट्रिक कार की खरीद पर सब्सिडी, रोड टैक्स और पंजीयन शुल्क में छूट जैसी कई रियायतें दे रही हैं।

लेकिन फिर भी ऊंची कीमत, चयन के सीमित विकल्प और चार्जिंग की पर्याप्त सार्वजनिक सुविधा न होने के कारण हम जैसे तमाम ग्राहक फैसला नहीं कर पा रहे। दरअसल बुनियादी सुविधाओं के विकास के साथ-साथ भारतीय बाजारों को सस्ते विकल्प की जरूरत है। उम्मीद करिए जल्द ही हम और आप भी स्वच्छ भारत अभियान को आगे बढाते हुए इलेक्ट्रिक कारों की बोनेट पर कोहनी टिका फोटो खिंचवा सकेंगे।

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