तटस्थता ही विकल्प
यूक्रेन के इर्द-गिर्द तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। खबरों के अनुसार यूक्रेन की सीमा के निकट रूस ने अपने क्षेत्र में एक लाख से ज्यादा सैनिक तैनात किए हैं। इस बीच अमेरिका अपने और अधिक सैनिकों को यूरोप भेज रहा है। पेंटागन के प्रेस सचिव जॉन किर्बी ने गुरुवार को कहा कि यूक्रेन पर …
यूक्रेन के इर्द-गिर्द तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। खबरों के अनुसार यूक्रेन की सीमा के निकट रूस ने अपने क्षेत्र में एक लाख से ज्यादा सैनिक तैनात किए हैं। इस बीच अमेरिका अपने और अधिक सैनिकों को यूरोप भेज रहा है।
पेंटागन के प्रेस सचिव जॉन किर्बी ने गुरुवार को कहा कि यूक्रेन पर रूस के सैन्य आक्रमण की आशंका के बीच अमेरिकी सैन्यबलों की तैनाती का मकसद अमेरिका और संबद्ध सहयोगियों का मनोबल बढ़ाना है। जबकि रूस ने इस कदम पर आपत्ति जताते हुए इस तैनाती को निराधार और विनाशकारी बताया।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कह रहे हैं कि पश्चिमी देश रूस की सुरक्षा चिंताओं पर ध्यान नहीं दे रहे हैं जबकि ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने यूक्रेन की सीमा पर रूस की ‘शत्रुतापूर्ण गतिविधि’ को लेकर गहरी चिंता प्रकट की। अमेरिका ने पूरे यूरोप में बढ़ती इस आशंका को रेखांकित किया है कि राष्ट्रपति पुतिन यूक्रेन पर आक्रमण करने को आतुर हैं।
और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के पूर्वी यूरोप में छोटे सदस्य देश इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगली बारी उनकी हो सकती है। रूस और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने से भारत पसोपेश में है। बदलते भू राजनीतिक समीकरण में यह स्थिति भारत के लिए चिंताजनक तो है ही क्योंकि रूस न केवल भारत का परंपरागत मित्र रहा है बल्कि भारत अपने सैनिक साजो-सामान का 55 फीसदी रूस से ही खरीदता है।
गौरतलब है कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के मामले में रूस ने अभी तक किसी का पक्ष नहीं लिया है। यदि भारत ने इस मामले में अमेरिका को अप्रत्यक्ष रुप से भी समर्थन देने की कोशिश की तो इसका रूस के साथ संबंधों पर गहरा असर होगा। सैन्य टकराव होने की स्थिति में अमेरिका चाहेगा कि भारत रूस के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करे।
अमेरिका भी भारत के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन पर अंकुश लगाने की जो रणनीति बनाई गई है, उसमें भारत और अमेरिका की भूमिका प्रमुख है। भारत, अमेरिका और रूस के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश में है।
इसी के चलते उसने 31 जनवरी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यूक्रेन तनाव पर चर्चा के लिए हुई वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया लेकिन जब चर्चा हुई तब वहां मौजूद भारत के प्रतिनिधि ने इस तनाव को कम करने और क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की अपील की। इस मामले में भारत को इंतजार करो और देखो की नीति पर अमल करते हुए तटस्थ रहना सबसे बढ़िया विकल्प है।
