बदायूं: बाजार में मिल रहे होली के रेडीमेड पकवान

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बदायूं,अमृत विचार। कामकाजी और नौकरपेशा महिलाओं को भी अब होली के पकवान बनाने और तामझाम इकट्ठा करने की जरूरती नहीं। होली के पकवान बाजार में उपलब्ध हैं। होली पर खास तौर पर गुझिया, सेव, शक्करपारे, मठरी समेत तमाम आइटम घर पर बनाने पर महिलाओं को कई दिनों तक मशक्कत करना पड़ती है। सबसे ज्यादा टेंशन …

बदायूं,अमृत विचार। कामकाजी और नौकरपेशा महिलाओं को भी अब होली के पकवान बनाने और तामझाम इकट्ठा करने की जरूरती नहीं। होली के पकवान बाजार में उपलब्ध हैं। होली पर खास तौर पर गुझिया, सेव, शक्करपारे, मठरी समेत तमाम आइटम घर पर बनाने पर महिलाओं को कई दिनों तक मशक्कत करना पड़ती है।

सबसे ज्यादा टेंशन उन महिलाओं को होता है जो कामकाजी हैं अथवा नौकरपेशा हैं। इनको जब अवकाश मिलता है तब पकवान बनाती हैं। होली के त्योहार पर तमाम काम होते हैं। पकवान बनाने में काफी समय लगता है। लेकिन उनकी टेंशन बाजार दूर करेगा। बाजार में तमाम इस तरह की दुकानें लग गई हैं, जहां घरेलू त्योहारी पकवान के आइटम उपलब्ध हैं। बस पैसा फेंको और हर तरह के पकवान बाजार से ले आओ। यह पकवान बिल्कुल घरेलू लगेंगे। मेहमानों के सामने पूरी धाक भी बनी रहेगी।

कुछ महंगे होते हैं बाजार के पकवान
बाजार में बिल्कुल घरेलू पैटर्न पर पकवान बनाकर बेचे जा रहे हैं। कोई यह पता नहीं लगा सकेगा कि यह घर पर बने हैं या बाजार से लाए हुए हैं। घर पर पकवान बनाने पर कुछ सस्ता जरूर पड़ता है लेकिन यह भी ऐसे महंगे नहीं हैं। घर पर महिलाओं को जितनी मशक्कत करनी पड़ती है उस हिसाब से इनके रेट ज्यादा नहीं हैं।

समय की हो जाती है बचत
महिलाओं को होली के त्योहर पर पकवान बनाने को पड़ोसी महिलाओं का सहयोग लेना पड़ जाता है। अपना खुद का समय तो लगता ही है, उनका भी समय लगता है। इससे अन्य त्योहारी काम प्रभावित होते हैं। घर में साफ-सफाई और त्योहारी शॉपिंग करना आदि भी काम प्रभावित होते हैं। बाजार के घरेलू पकवान से बहुत राहत मिलती है।

होली के पकवानों की कीमत प्रतिकिग्रा
गुझिया                                280 रुपये
शक्करपारा                         160 रुपये
मठरी                                 140 रुपये
सेव                                    140 रुपये
सेमें                                   160 रुपये

बाजार में होली के त्योहार के पकवान मिल जाना अच्छी बात है। इससे महिलाओं का समय बचता है। पुराने समय की बात अलग थी, पहले ज्यादातर घरेलू महिलाएं थीं।
—इति अधिकारी

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