दुनियां का सबसे छोटा युद्ध जो महज 1 घण्टे तक चला

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विश्व का सबसे छोटा युद्ध ब्रिटेन और जंज़ीबार के बीच हुआ था जो एक घंटे से भी कम चला। जंज़ीबार के सुल्तान द्वारा अपनी गद्दी छोड़ने से इनकार करने के बाद यह एंग्लो-जंज़ीबार युद्ध 27 अगस्त, 1896 को सुबह 9 बजे शुरू हुआ था। यह कहानी साल 1890 में ब्रिटेन और जर्मनी के बीच हेलिगोलैंड-जांजीबार …

विश्व का सबसे छोटा युद्ध ब्रिटेन और जंज़ीबार के बीच हुआ था जो एक घंटे से भी कम चला। जंज़ीबार के सुल्तान द्वारा अपनी गद्दी छोड़ने से इनकार करने के बाद यह एंग्लो-जंज़ीबार युद्ध 27 अगस्त, 1896 को सुबह 9 बजे शुरू हुआ था। यह कहानी साल 1890 में ब्रिटेन और जर्मनी के बीच हेलिगोलैंड-जांजीबार समझौते से शुरू होती है। इस समझौते के तहत ईस्ट अफ्रीका का जांजीबार क्षेत्र ब्रिटेन ने ले लिया था, जबकि मुख्य क्षेत्र तंजानिया पर जर्मनी का नियंत्रण था।

इस संधि के बाद ब्रिटेन ने जांजीबार को अपना संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया और वहां हमद बिन थुवैनी को सुल्तान के रूप में बैठा दिया जो पूरी तरह से ब्रिटिश समर्थक था। ब्रिटेन उसे अपने हुक्म का गुलाम मानता था। साल 1893 में ब्रिटेन ने उसे जांजीबार के सुल्तान के रूप में मान्यता दी। लेकिन सिर्फ तीन साल बाद 25 अगस्त, 1896 को सुल्तान की मौत हो गई।इसके बाद सुल्तान के चचेरे भाई ने खालिद बिन बरगश ने सत्ता हथिया ली।

वह ब्रिटिश विरोधी था और अपने देश को आजाद करना चाहता था। हमद बिन थुवैनी की मृत्यु के कुछ ही समय के भीतर बिना उनकी अनुमति के खालिद बिन बरगश द्वारा खुद को सुल्तान घोषित कर दिए जाने से ब्रिटिश डिप्लोमैट्स बहुत नाराज थे। उन्हें यह भी पता था कि खालिद ब्रिटिश विरोधी है। इसके तत्काल बाद इलाके के प्र्मुख डिप्लोमैट बासिल केव ने खालिद को सुल्तान के पद से हट जाने को को कहा, लेकिन खालिद ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। खालिद ने अपने महल के पास फौज जुटानी शुरू कर दी। इससे ब्रिटिश डिप्लोमैट्स की समझ में यह बात आ गई कि खालिद उनके कहने भर से सत्ता छोड़ने वाला नहीं है।

हमद बिन थुवैनी की मौत रहस्यमय तरीके से हुई। कोई भी नहीं जान सका कि आखिर ठीक ठाक रहा सुल्तान अचानक मर कैसे गया। ब्रिटिश समर्थकों और राजदूतों को यह संदेह था कि खालिद ने सुल्तान को जहर दे दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।
खालिद ने 25 अगस्त तक अपने महल के पास 3000 सैनिकों की तैनाती कर दी। लेकिन इनके पास जो तोपें और बंदूकें थीं, वो अंग्रेजों ने खालिद के पहले सुल्तान रहे उसके चाचा हमद बिन थुनैवी को उपहार के रूप में दी थीं। खालिद ने हार्बर में भी एक आर्म्ड रॉयल याट तैनात कर दिया।

ब्रिटिश सरकार सुल्तान के रूप में हामूद बिन मुहम्मद को जगह देना चाहती थी। खालिद को स्थानीय ब्रिटिश वारिस को गद्दी सौंपने के लिए 27 अगस्त, 1896 को 9 बजे सुबह तक का समय दिया गया। खालिद ने गद्दी छोड़ने से इनकार कर दिया और लगभग 3000 सैनिकों के साथ महल में डटा रहा। इसके बाद अंग्रेजों के सामने युद्ध के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं था। मुख्य राजदूत केव ने ब्रिटेन के फॉरेन ऑफिस को एक टेलिग्राम भेजा, क्योंकि उसे पता था कि बिना ब्रिटिश सरकार की स्पष्ट स्वीकृति के अपने स्तर पर वह कोई युद्ध नहीं छेड़ सकता था।

जबकि उसने तैयारी पूरी कर ली थी। तुरंत उसे सुल्तान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करने की इजाजात मिल गई और दूसरे ही दिन हार्बर में दो और ब्रिटिश वॉरशिप आ गई, जिनके नाम थे एचएमएस रैकून और एचएमएस सेंट जॉर्ज। अंग्रेजों ने 5 ब्रिटिश रॉयल नेवी जहाजों, दो गनबोट, 150 मरीन और 900 जंजीरी सैनिकों के साथ महल को घेर लिया। ठीक सुबह 9 बजे जब खालिद ने पद और महल छोड़ने से इनकार कर दिया, तो ब्रिटिश बमबारी शुरू हुई।

जहाजों के तोपों ने सुल्तान के महल में गोलीबारी की। लकड़ी की संरचना वाला महल तहस-नहस हो गया। ब्रिटिश फायरिंग 9.40 पर बंद हो गई। खालिद के 500 सैनिक मारे गए, जबकि बस एक ब्रिटिश सैनिक घायल हुआ, जिसकी जान बचा ली गई। खालिद महल के पिछले दरवाजे से भाग गया और उसने जर्मन वाणिज्य दूतावास में शरण ले लिया। इसके बाद अंग्रेजों ने दोपहर तक एक नये सुल्तान हामुद को जांजीबार की गद्दी पर बैठा दिया जिसने अगले 6 साल तक वहां सत्ता संभाली।

खालिद अपने कुछ समर्थकों के साथ जर्मन दूतावास में चला गया था। ब्रिटेन ने लगातार उसके प्रत्यर्पण की मांग की, पर जर्मनी ने उसे नौसेना की सहायता से तंजानिया भेज दिया। आखिर 1916 में जब ब्रिटिश सेना ने ईस्ट अफ्रीका पर हमला किया तो 1916 में खालिद को पकड़ा गया और उसे सेंट हेलेना द्वीप पर निर्वासित कर दिया।

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  • निखिलेश मिश्रा

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