सीतापुर: देख-रेख के आभाव में अस्तित्व खो रहा आस्तिक बाबा मंदिर, पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है यह धार्मिक स्थल
संदना/सीतापुर। इष्टिका शिल्पकला की दुर्लभ व मन-मोहक कारीगरी को दर्शाता आस्तिक बाबा मंदिर की प्राचीन इमारतों के अब अवशेष ही बचे हैं। इस जगह को सहेजने के लिए पुरातत्व विभाग ने अपने सरंक्षण में भले ही ले लिया हो, पर यहां एक बोर्ड व चारदीरी निर्माण के अलावा अभी तक और कुछ नही किया गया …
संदना/सीतापुर। इष्टिका शिल्पकला की दुर्लभ व मन-मोहक कारीगरी को दर्शाता आस्तिक बाबा मंदिर की प्राचीन इमारतों के अब अवशेष ही बचे हैं। इस जगह को सहेजने के लिए पुरातत्व विभाग ने अपने सरंक्षण में भले ही ले लिया हो, पर यहां एक बोर्ड व चारदीरी निर्माण के अलावा अभी तक और कुछ नही किया गया है। देख-रेख के आभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे जमींदोज होती जा रही है। जिला मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर संदना थाना क्षेत्र के नसीराबाद गांव के पश्चिम यह प्राचीन मंदिर स्थित है।
पुरातत्व विभाग भी इसे अवध क्षेत्र की महत्वपूर्ण धरोहर मानता है। इस मंदिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रमाण नही है। लेकिन पुरातत्व विभाग द्वारा लगाये गये बोर्ड में लगभग 12वीं या 13 वीं सदी में इसके निर्माण की बात दर्ज कराई गयी है। मान्यता है कि सतयुग काल में राजा मांधता का राज हुआ करता था। उसी दौरान राजा के पूर्वजों ने यह मन्दिर बनवाया होगा। नक्काशीदार ईंटो से निर्मित यह मंदिर आस्तिक, इष्टिका अथवा अक्टीक बाबा के नाम से प्रसिद्ध है।
इस मंदिर परिसर में दो बड़े व कई छोटे-छोटे मंदिर थे। जिनमें अब बड़े मंदिरों की दीवारें और छोटे मंदिरों की नींव ही बची है। मंदिर की ईंटो पर कुंडल, फूल, खुर, कुम्भ व कलश बने हैं। मंदिर में चंद्रशाल व पत्थर की आकर्षक मूर्तियां विराजित थी। जो देख रेख के आभाव में चोरी हो गई। लेकिन आज भी क्षेत्र के लोगों की इस मंदिर के प्रति अपार श्रद्धा है। पूजा-अर्चना के अलावा नव दंपती यहां आशीर्वाद लेकर वैवाहिक जीवन की शुरुआत करते हैं।
मंदिर के पड़ोस स्थित टीले में भी दफन हैं राज
आस्तिक बाबा मंदिर के करीब एक विशाल टीला है। यह टीला भी अपने आप में ऐतिहासिक विरासत संजोए है। पुरातत्व विभाग ने इस टीले पर भी अपने सरंक्षण का बोर्ड लगा रखा है। लेकिन आज तक टीले में दफन राज सामने लाने के प्रयास नहीं किए गए हैं। आस्तिक बाबा मंदिर के बाकी अवशेष की देख-रेख कर इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजा जा सकता है।
पास के गांव नसीराबाद में रहने वाले रामविलास बताते हैं कि हम लोग बचपन से मंदिर को इसी रूप में देखते आ रहे हैं। पूर्वजों से इसके बारे में बस कहानियां सुनी हैं, कि राजा मांधाता के पुरखों ने इसे बनवाया था। ग्रामीण सुरेन्द्र कहते हैं कि इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। जिससे बचे खंडहर भी देखरेख न होने से गिरते जा रहे हैं।
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