मेरा देश महान

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“मैडम मैडम कार रोकिए आपकी साड़ी का पल्लू दरवाज़े में फंसा है।” ऐसा कहते हुए एक आदमी हमारी कार के पीछे दौड़ रहा था। “इसमें नया क्या है? ऐसा तो रोज़ होता है हमारे यहां। तुम भी ना एक बार ऐक्सिडेंट करा कर ही मानोगी।’’ ग़ुस्से में पति ने कार को ब्रेक मार कर रोका। …

“मैडम मैडम कार रोकिए आपकी साड़ी का पल्लू दरवाज़े में फंसा है।” ऐसा कहते हुए एक आदमी हमारी कार के पीछे दौड़ रहा था। “इसमें नया क्या है? ऐसा तो रोज़ होता है हमारे यहां। तुम भी ना एक बार ऐक्सिडेंट करा कर ही मानोगी।’’

ग़ुस्से में पति ने कार को ब्रेक मार कर रोका। बेचारा…वो अजनबी दौड़ कर आया और कार का दरवाज़ा पूरा खोल मेरा पल्लू अंदर किया और बड़ी शालीनता से दरवाज़ा बंद किया। मेरी आंखें उसकी आंखों से टकराईं। बड़ी शालीन आंखें थीं वो। मैं थैंक्स या शुक्रिया कहती उसके पहले ही पति ने गाड़ी स्टार्ट कर दी। मैंने पीछे मुड़ उसे हाथ से ही शुक्रिया अदा करने की ऐक्टिंग की। पति पूरे रास्ते बड़ बड़ करते रहे।

अगले दिन उसी रास्ते से मैं ड्राइवर के साथ हॉस्पिटल जा रही थी, अचानक नज़र लाल सेबों पर पड़ी। अरे, ये तो कल वाला ही आदमी है।“मेम साब सेब ले लीजिए, देख कर दाम लगा देंगे। एकदम फ़्रेश हैं, शिमला के हैं।’’ पीछे दूसरी कार वाला लगातार हॉर्न बजा रहा था, उसका रास्ता जो मैंने रोक रखा था। “कोई बात नहीं मैडम जाइए, आप सामने रहती हैं ना, घर पर पहुंचा देंगे।”

मैं हैरान! कल साड़ी और आज घर… इससे पहले कभी देखा नहीं। थोड़ा आगे बढ़ने पर ड्राइवर से पूछा,“कौन था वो? पहचानते हो उसे।” ड्राइवर ने बताया,“नहीं मैडम लॉक डाउन होने से बहुत सारे ऑटो वाले कैब वाले भी रास्ते में सब्ज़ी और फलों के ठेले लगाने लगे हैं। उन्हीं में से एक है। इंग्लिश भी जानता है। कल एक लड़के का आधार कार्ड फ़ॉर्म भरा रहा था।”

शाम की ओपीडी क्लिनिक ख़त्म कर घर पहुंची तो फिर उसी शख़्स से सामना हुआ। बड़े अच्छे फ़्रेश फल और सब्ज़ियां लिए बैठा था। मेरा तो मानो उसने दिल जीत लिया, बहुत दिनों बाद बथुआ भाजी और सरसों साग, मेरा दिल तो बाग बाग हो गया। “नमस्ते मैडम, बंदा हाज़िर आपसे वादा किया था। आप को देख कर ही समझ गया था आप हैदराबाद से नहीं दिल्ली की हैं। इसीलिए बथुये का साग भी ले आया।’’

“कितने पैसे हुए?” पूछने पर कहने लगा,“अरे इस बार इसे मेरी भेंट समझ लें, अगली बार पैसे ले लूंगा। आपने और साहेब ने कितने लोगों की जान बचाई है।”

“ड्राइवर इससे कह दो या तो पैसे ले या सामान ले जाए।’’ मेरे सख़्ती से कहने पर नानुकुर करते हुए उसने पैसे ले लिए और चला गया।

दूसरे दिन फिर सुबह सुबह ताज़ी मटर और ललचाने वाली गाजर ले कर हाज़िर था। मैंने पूछा,“क्या नाम है तुम्हारा?”

“माई नेम इज़ डेनियल। माई फ़्रेंड्ज़ कॉल मी डैनी। यू केन ऑल्सो कॉल मी डैनी। ”मैं अवाक् बाप रे धुआंधार इंग्लिश पढ़ा लिखा लगता है। “कितना पढ़े हो?” मेरा बड़ा रूड प्रश्न था। “आई हैव डन बी ए ओनर्स इन इंग्लिश।’’

मेरा अगला पहले से भी ज़्यादा चुभने वाला प्रश्न,“पढ़े लिखे हो फिर ये सब्ज़ी भाजी क्यों?”

उसका उतना ही नम्र जवाब,“पढ़ने के बाद भी कोई नौकरी नहीं मिली। लोन से एक कार ले ली। ओला पूल ज्वाइन कर लिया, अब लॉक डाउन में ख़ुद को बेचने की नौबत आ गई। मरता क्या ना करता।।।बस।”

शायद उसने भांप लिया था कि उसका इंग्लिश बोलना मुझे नहीं अच्छा लग रहा था इसलिए सीधी साधी हिंदी में जवाब दिया। मेरे पास बोलने के लिए कुछ नहीं था, चुपचाप सब्ज़ी ली, पैसे दिए जो बाज़ार भाव से काफ़ी कम थे।

वो चला गया। ये हमारे परिचय की शुरुआत थी। उसके बाद मेरे दिलो दिमाग़ पर डैनी छा गया। वो उस सड़क मार्केट में सभी का चहेता था। पति मेरे ऊपर गुर्राते,“व्हाट इज़ दिस? ना जानती ना पहचानती, इतना घर में घुसाना ठीक नहीं।’’

मैं कहती,“अरे शरीफ़ है, पढ़ा लिखा है। लॉकडाउन ने सबकी बैंड बजा दी है वरना दो दो कारों का मालिक था।’’

हम भी घर पर अकेले रहते थे, दोनों बच्चे बाहर रहते थे। छोटे-छोटे कामों के लिए मुझे डैनी की ज़रूरत पड़ने लगी थी। ड्राइवर नहीं आया तो वो मेरा ड्राइवर बन जाता। किचन के कामों में भी उसका जवाब नहीं था। कुक के ना आने पर इतने अच्छे मोमो मंचूरीयन और ना जाने क्या क्या बना कर खिलाने लगा था।

केवल छः महीने में डैनी मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा बन गया। बेटे की पुरानी टी शर्ट शॉर्ट्स में पीछे से वो मेरे बेटे जैसा ही लगता। कई बार जब मै उसके साथ शॉपिंग के लिए जाती और किसी मित्र ने अगर दूर से देख लिया तो घर पहुंच कर एक फ़ोन आता,“वाह क्या बात है? बड़ा मटक रही है, बेटा जो आया है।”

मुझे हर बार बताना पड़ता ये बेटा नही बेटे जैसा डैनियल है। एक साल आते तक तो वो मेरे सारे हॉस्पिटल के दोस्तों और दूसरे सारे दोस्तों का चहेता बन गया था। केवल पति ही खिंचे खिंचे रहते और हर वक़्त समझाते कि किसी अनजान को इतनी जगह देने की ज़रूरत नहीं है। उसने मुझे बताया था कि उसकी बीबी मारिया दो बच्चों के साथ गोवा में रहती है और वो वहां एक स्कूल में पढ़ाती है।

दो बार वो एक हफ़्ते के लिए अपने बच्चों के पास गया भी था। मेरी तो उन दिनों हालत बड़ी ख़राब थी, क्योंकि मेरे तो सारे काम वही करने लगा था यहां तक कि बैंक के भी। लेकिन मजाल है कि पति देव ने एक भी काम उससे कराया हो। वो बहुमुखी प्रतिभा का धनी था।

वो इलेक्ट्रिशन, प्लम्बर, कार्पेंटर यहां तक की ज़रूरत पड़ने पर मोची का काम भी कर सकता था और पाक विद्या भी उससे अछूती नहीं थी। मेरे दिलो दिमाग़ पर पूरी तरह से डैनी छाया हुआ था। बच्चे भी दूसरे देशों में फंसे थे और सुबह शाम मेरे फ़ोन का इंतज़ार करते थे। उनके साथ लैप टॉप पर रूबरू बात कराना भी डैनी की ही ज़िम्मेदारी थी। बच्चे भी हैरान! मां इतनी टेक्नोक्रेट कैसे बन गयी।

अपनी सब्ज़ी बेचने से हुई कमाई और इधर इधर के कामों से हुई कमाई वो मेरे पास ही रखता था। उसका कोई ख़र्चा नहीं था क्योंकि उसका खाना पीना सब हमारे नहीं तो जिसकी भी वो हेल्प करता था उनके यहां हो जाता था। मेरे घर पर उसका एक बैग था जिसमें वो पैसे रखता था।

एक दिन बड़ा ख़ुश था और कहने लगा,“मैडम मेरे पास तीन लाख रुपया जमा हो गया है। मैं आपके अकाउंट में जमा कर देगा और आपके अकाउंट से अपना सिस्टर को आरटीजीएस कर देगा।”

मैं हैरान,“सिस्टर को क्यों मारिया को क्यों नहीं!”

डैनी,“मारिया जॉब करता है। शी हैज़ इनफ़ मनी। सिस्टर का हसबैंड का जॉब नहीं है। छोटा-छोटा बच्चा है उसका।’’

मै तो उसके इस रूप पर भी फ़िदा हो गयी। मैंने उसके लाए आरटीजीएस फ़ॉर्म में भी साइन कर दिया। ये सिलसिला चलता रहा। उसके पास ना आधार कार्ड था ना पैन कार्ड, इसीलिए पति उससे दूर रहने कहते थे।

मेरे अकाउंट में जितने पैसे जमा करता उतने ही का वो आरटीजीएस करता था। इससे मैं वैसे ही केयरलेस थी और कुछ डैनी की अन्धभक्ति ने बना दिया था।

एक दिन सुबह-सुबह बड़ा उखड़ा सा डैनी आया और कहने लगा,“मैम घर से फ़ोन आया है मारिया बीमार है, कोविड हो गया है। इतना समझाया था बिना मास्क के कहीं जाना नहीं। बच्चे छोटे छोटे हैं, जाना पड़ेगा।”

मैं भी उसकी परेशानी देख उतनी ही परेशान हो गई। मैंने भी उसे जाने की सलाह दी।

वो कहने लगा,“हैदराबाद बहुत सेफ़ है, गोवा जाने में मेरी जान को भी ख़तरा है। मारिया भी मना कर रही है।’’

उसके पास जो फ़ोन था वो एक दूसरे सब्ज़ी वाले उस्मान के नाम का था, क्योंकि उसका आधार कार्ड और पैन कार्ड दोनों ही लॉकडाउन के जस्ट पहले गुम गया था। दो तीन दिनों वो बड़ा परेशान था और मैं भी कुछ भी करने को तैयार थी। ठीक वैसी ही तड़प थी जो बच्चों के बीमार होने पर हुआ करती थी।अचानक वो ग़ायब हो गया और उसका फ़ोन भी बंद आ रहा था जो उसका नहीं था।

कुछ समझ नहीं आ रहा था। इन दो सालों में हमारा एक ऐसा रिश्ता हो गया था जो केवल महसूस किया जा सकता था। पति को इस सबसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था वो बड़े शांत थे और मेरी टांग खिंचने का कोई मौक़ा नहीं चूक रहे थे।

मेरे दस दिन इस तरह गुज़रे मानो किसी क़रीबी की मौत हो गई हो। उसका ज़िंदगी से इस तरह बिना बताए जाना मुझे बड़ा चुभ रहा था। एक सुबह अचानक उसी सड़क पर बैठने वाला मोची रामू मेरे घर आया और बदहवास सा चिल्लाने लगा,“डॉक्टर मैडम कुछ कीजिए डैनी को पोलिस पकड़ के ले जा रही है। वो रो रहा है लेकिन पोलिस उसे आतंकवादी कह रही है। उसका नाम भी अशरफ है। मैडम मेरा यार सब कुछ हो सकता है देश द्रोही नहीं।’’

मुझे तो जैसे पाला मार गया कि ये रामू क्या बोले जा रहा है। वो तो बोलता ही जा रहा था,“मैडम उसे डैनी नाम रखने को अपन हिच बोला था। उसका अशरफ़ नाम पे कोई काम भी नई देता और घर भी नहीं दे रहा था। उसका पुराना घर मेरी बहन के घर के पास था।

वहां सब हिन्दू लोग थे, उसको लॉकडाउन में गवरनामेंट गाड़ी का दाल चावल भी नहीं लेने देते थे। वो बिचारा तो मरने को जा रहा था। मैं इच उसको बोला फ़ेमिली को गांव भेज के इधर आने को। वो सब काम जानता है। रात को भी कन्स्ट्रक्शन साइट पर जाके हेल्प करता था।’’ मैंने पूछा,“फ़ैमिली गांव कौन सा? गोवा…”

“अरे नई मैडम आपको ऐसेइच गोवा बोला। उसका बीबी बच्चा लोग कानपुर के पास उन्नाव में रहता है।’’

रामू बोलता जा रहा था,“उसके पास आधार कार्ड था। मैं इच उसको छिपा के रखने के लिए बोला। आप कुछ करिए मैडम, वो बहुत अच्छा है। आप तो जानते हैं ना।’’

मैं भी चिल्लाने लगी,“तुम्हें लगता है कि मुझे किसी के मुसलमान या ईसाई होने से फ़र्क़ पड़ता है। मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाऊंगी।’’

पति देव तो खा जाने वाली नज़रों से मुझे देख रहे थे मानो मैंने कोई बड़ा गुनाह किया हो,‘‘कितनी बार समझाया है बिना पुलिस वेरिफ़िकेशन के किसी को घर में घुसने मत दो। आप तो चेहरा देख के लोगों की सच्चाई भांप लेती हैं। अब भुगतो।”

मुझे तो मानो सांप सूंघ गया। बेटे जैसा क्या कुछ समय तो बेटे से भी बढ़कर। अभी पहली वेव में मुझे कोविड हुआ था तो पति भी नहीं आते थे मेरे पास। डैनी था, जो रात दिन मेरी सेवा कर रहा था। कोविड कोढ़ से ज़्यादा दुतकारा जा रहा था। दोनों बच्चे फ़्लाइट बंद होने की वजह अपनी अपनी जगहों पर अटके हुए थे।

क्या फ़र्क़ पड़ता है मुझपे जान लुटाने वाला डैनी नहीं अशरफ़ है। मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही थी कि मैं कुछ नहीं कर पा रही हूं और वो बेचारा देश द्रोही की उपाधि लिए जेल में सड़ रहा था।

आज इंटरनैशनल विमिन्स डे है, जिसका मुझे बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता है। अपने हॉस्पिटल के अलावा यहां वहां कुछ विमिन्स ऑर्गनाइज़ेशन में भी बतौर गेस्ट बुलाया जाता है। और यहां मेरे पास बुक अकाउंट की सीआईडी तफ़सील कर रही है कि हर महीने मेरे अकाउंट में कुछ कैश जमा होता है और उतना ही पैसा उसी दिन उन्नाव की किसी जमिला बी के अकाउंट में आरटीजीएस होता है और बक़ायदा मेरी साइन के साथ।

मैं ख़ुद के एक कटघरे में खड़ी हूं, जहां मेरी भर्त्सना मेरे पति और दोनों बच्चे फ़ोन पर कर रहे हैं। सारे दोस्त मुझे स्टूपिड लेडी का ख़िताब दे किसी तरह यहां वहां फ़ोन कर मेरे बचाव के रास्ते सोच रहे हैं। कोई भी ये विश्वास करने को तैयार नहीं है कि मैं एक ख़ाली आरटीजीएस के पेपर पर साइन करती थी और बाक़ी डीटेल्स मेरा लाड़ला डैनी उर्फ़ अशरफ़ भरता है।

इतना कैश ट्रान्ससेक्शन एक साल से और वो भी एक मुसलमान औरत को, इससे इनकम टैक्स डिपार्टमेंट वाले भी लगातार फ़ोन किए जा रहे हैं। मैं मूरख अभी भी सोच रही हूं, देखो हम कैसे हिंदू मुसलमान में बंट गए हैं

कि एक बेचारे अशरफ़ को डैनी बन अपना गुज़ारा करना पड़ रहा है। उसे ये क्यों करना पड़ा? क्या सचमुच हिंदू बस्ती में उसका जीना हराम हो गया था? इन प्रश्नों पर किसकी ध्यान नहीं था, सचमुच मेरा देश महान।

*डॉ संगीता झा*

 

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